Monday, February 22, 2010

हम इंसान हैं, हमें इंसान ही रहने दो...हिन्दू और मुस्लिम न बनाओ...

देखो, ये इंसान हैं

अहमदाबाद में हिन्दू और मुस्लिम इतने खौफज़दा हैं कि साथ रहने को तैयार नहीं सरकारी मकानों के आवंटन के बाद दोनों समुदायों के लोगों ने कहा है कि वे अपने समुदाय के बहुसंख्यक वाले अपार्टमेन्ट में ही रहेंगे नरेंद्र मोदी को तिलंगी यानि पतंग उड़ने की जगह इसपर काम करना चाहिए उनसे उम्मीद तो बिलकुल नहीं है लेकिन फिर भी मुख्यमंत्री तो गुजरात का है न।

ये विचार रवीश कुमार जी ने आज अपने फेसबुक की दीवाल पर चिपकाया है। देश भर से लोग इसपर अपने विचार दे रहे हैं। मुझे इसे पढ़कर बहुत दुःख हुआ। पहली वजह की अगर ये सच है तो हालत में सुधार क्यूँ नहीं हो रहा है। दूसरी वजह कि बार बार लोग आग क्यूँ भड़काने लगते हैं। हम कब तक हिन्दू मुस्लिम चश्मे से देखेंगे। कोई इंसान है भी कि नहीं। इसे पढ़ने के बाद तो ऐसा लगा जैसे गुजरात में एक भी इंसान नहीं है। या तो वो हिन्दू है या मुस्लिम।

उनकी इस भावना के कई मतलब निकलते हैं। पहला ये कि वाकई गुजरात इंसानों के रहने लायक नहीं है। लोग आज भी दंगों से प्रभावित हैं। जाहिर है, इतनी जल्दी उसका दर्द नहीं मिटेगा पर इसका मतलब ये नहीं है कि हम उनके घाव पर नमक लगाते रहें। सभी जानते हैं कि गड़े मुर्दे नहीं उखाड़ने चाहिए फिर भी न जाने क्यूँ बार बार ऐसी बातें सर उठा लेती हैं। न जाने कैसी सोच हैं ये जो इंसान को मजबूर करती है हिन्दू या मुसलामान बनने के लिए।

हर धर्म में ऐसे लोग हैं जिनका काम सिर्फ भड़काना है। और खौफज़दा न हिन्दू है न मुसलामान, वो तो सिर्फ इंसान है। एक आम इंसान जो जियो और जीने दो में यकीं रखता है।

दूसरी बात महसूस होती है कि क्या इस समाज में सिर्फ ऐसे ही लोग हैं। जो साथ रहना पसंद करते हैं। ऐसे हिन्दू और मुस्लिम नहीं हैं जो एक दूसरे से बेपनाह मोहब्बत करते हैं। वे खुश हैं साथ रहकर क्यूंकि वो जानते हैं कि वो महज इंसान हैं। हम ऐसे लोगों को अपनी पोस्ट में जगह क्यूँ नहीं देते। उन्हें ख़बरों में क्यूँ नहीं शामिल करते, इसलिए क्यूंकि वे सनसनीखेज नहीं है। या इसलिए कि वो प्यार और अमन के रहनुमा हैं। कुछ लोग उन्हें बार बार ये बताने लगते हैं कि भाई देखो, तुम वही मुस्लिम हो जिन्हें हिन्दुओं ने गुजरात में बेदर्दी से मारा था। तुम वही हिन्दू हो जिसे ट्रेन में मुस्लिमों ने जिन्दा जला दिया था।

वाह रे आज के ओपिनियन लीडर्स। क्या बेहतरीन काम कर रहे हैं आप सब। नहीं जनता मैं, कि ऐसा करके आप सबको कैसी संतुष्टि मिलती है पर निश्चित ही ये सोच विध्वंसकारी है। बेहतर होगा कि इससे नाता तोड़ लें। समाज की ख़ुशी के लिए ही सही। वादा है, आप को भी उतनी ही ख़ुशी होगी।

ये ज्ञान लगता है पर सच है कि वक़्त के साथ आगे बढ़ना चाहिए। अगर ऐसी बातें आएदिन दोहराई जाएंगी तो फिर आग भड़केगी। फिर दंगे होंगे और होते रहेंगे। कभी तो हमें दिल से कौमी एकता की बात करनी होगी।

4 comments:

संजय बेंगाणी said...

यह तो धर्म है. रवीश जैसे लोग जहाँ से आते है वहाँ जातियों के आधार पर सेनाएं बनी हुई है. एक दुसरे का गला काट रही है. वहाँ के बारे में महाशय का क्या कहना है? क्या वे वहाँ जाकर लोगों को समझाएंगे?

काशिफ़ आरिफ़ said...

अरे साहब ये लोग तो सिर्फ़ अपनी सत्ता की रोटिंया सेकंते हैं । ये सिर्फ़ लोगों की भावनाओं से खेलना जानते है.......

ना उन्हे किसी की ज़िन्दगी से मतलब है और ना ही किसी की मौत से...
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शहरोज़ said...

सही sawaal है. वैचारिक मतभेद संभव हैं.लेकिन क्या मनुष्योचित भाव का भी लोप हो गया!!.आग्रह है कि मेरा लेख कमीशन -दर-कमीशन नेताओं का है मिशन ज़रूर पढ़ें !

rajiv said...

Dear Niks pata nahi kyun shohrat ki bulandiyon per pahuchne vale sahaj nahi rah pate. Vo jo bolte ya ya likhte hain unme banavtipan kyun jhalakta hai. Raveesh Kumar bhi iska apvaad nahi hain. Unki Gambhirta , bholapan pata nahi kyun banavti lagati hai

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