Sunday, February 7, 2010

राहुल से राहुल गाँधी और फिर राजकुमार से लेकर रोम पुत्र तक...




राहुल गाँधी, यह वो नाम है जिसे सुनकर लड़कियों की बांछें खिल जाती हैं. एक अजीब सी उर्जा महसूस होती है वह इसलिए क्यूंकि हम महसूस करना चाहते हैं. मीडिया वालों की टीम तैयार होकर पीछे लग जाती है, और विपक्षी दलों की भृकुटी तन जाती है. बड़ा ग्लैमर है जनाब का. काफी लम्बे समय से उन्हें देख रहा हूँ. कभी टीवी स्क्रीन पर तो कभी अखबार और मगज़ीन के पन्नों पर. यूपीए की वापसी के शुरूआती दौर में सारे मीडिया में बड़ी हलचल थी. उनका इटली कनेक्ट, उसकी लाइफस्टाइल, उसकी गर्लफ्रेंड सबकी चर्चा थी. राजीव गाँधी का सुपुत्र होने का सारा लाभ मिल रहा था. तब किसी ने उन्हें राजकुमार का दर्जा नहीं दिया था. सुनने में आता था कि अभी वो बच्चा है, उसे राजनीति की समझ नहीं है. वाकई जो बातें कही जा रही थीं वो सच थीं.

फिर तख्तापलट हुआ. राहुल पहले तो राहुल गाँधी हुआ फिर राजकुमार कब बन गया, पता नहीं चला. फिर तगड़ी सियासत शुरू हुई. जिन दिमागों में बीते कुछ सालों में जंग लग चुकी थी, सत्ता के मोबिल ऑयल पड़ने पर दौड़ने लगे. राजकुमार, वाकई राजकुमारों से काम करने लगे. उनकी सोच, उनकी बोली, उनकी हरकतें, उनका अंदाज़ सब राजकुमारों सा हो गया. फिर एक दिन उन्होनें संसद में कलावती की बात की. वो कलावती जो विदर्भ के एक गाँव की रहने वाली थी. वो कलावती जो दलित थी. फिर क्या था, राहुल गाँधी, राजकुमार के साथ हीरो भी बन गए. ये वो दौर था जब लोगों ने ये भी कयास लगानी शुरू कर दी कि अगले प्रधानमंत्री तो राजकुमार राहुल ही होंगे. विजय अभियान जारी रहा.

फिर देशाटन शुरू हुआ. राज्यों के ऐसे जिलों और गाँव को चुना गया जहाँ दलित आबादी ज्यादा है. राहुल एक रात कहीं खाना खाते और अगली सुबह अख़बारों में छा जाते. ये आलम जारी रहा. यूपी के चुनाव में उनका दम नजर आया. एक बदलाव के रूप में राहुल को देखा जाने लगा. उनसे सबको बहुत उम्मीदें हो गईं. कैमरा उनसे चिपक गया. गनीमत थी कि उनके घर में कैमरे के घुसने पर मनाही थी. कभी कभी लगा कि ये प्रायोजित पॉपुलैरिटी है. पर कभी कभी लगा लड़का जेनुइन है. वाकई कुछ तो बात है. फिर काफी कुछ हुआ, जो उन्हें लोकप्रिय बनाता गया.

एक दिन उन्होंने कुछ कहा, शिव सेना ने धमकी दी कि मुंबई आये तो खैर नहीं. छोटे ठाकरे ने हुंकार भरी, रोम पुत्र कह डाला. लोगों ने ये पड़ताल नहीं की कि ये रोम पुत्र कहा क्यूँ गया. खैर, सबका ध्यान बयानबाज़ी पर था. राहुल गाँधी ने मुंबई के लिए उड़ान भरी, वो वहां पहुंचे ही थे कि सोशल नेटवर्किंग पर सवाल गिरने लगे. तारीफ होने लगी. ब्लॉग पर भी कसीदे पढ़े जाने लगे. फिर शुरू हुई राजनीति. काफी साल बाद ऐसी मंझी हुई प्लानिंग देखने को मिली, जो या तो एक्सपोज नहीं हुई या प्रायोजित तरीके से एक्सपोज नहीं की गई. राहुल ने जमकर ड्रामा किया. कभी चॉपर की फुलझड़ी तो अचानक एटीएम में घुसकर अचम्भित किया. और फिर लोकल की सवारी. दूसरी तरफ मुख्यमंत्री धूप में एक छोटी सी गली में खड़े उनका इंतजार करते रहे. ये तो छुपी छुपान लगने लगा. ठीक वैसा ही जैसे हम बचपन में किया करते थे. और खबर आने लगी शिव सेना हार गई. मुझे लगता है कि शिव सेना और मनसे ने अच्छा साथ निभाया. क्या शानदार खेल था. इस दौरान एक मंत्री ने राजकुमार या रोम पुत्र का जूता उठा लिया तो मामला और भी रंगीन हो गया.

सब गजब था, सबने तारीफों के पुल बांध दिए. न्यूज़ कि जगह वियूज ने ले ली. किसी ने राहुल को इब्न बतूता बना दिया तो किसी ने हीरो. किसी ने भारत मां का असली बेटा. खूब तारीफ हुई. लेकिन क्या हम इतने नादान थे कि सच्चाई नजर नहीं आई? मैं मानने को तैयार नहीं.

ये कहानी सबको पता है पर इसे क्रमवार देखा जाये तो पता चलता है कि किस तरह एक सामान्य से लड़के को हीरो बना दिया गया, राजकुमार बना दिया गया. उसे मनमोहन सिंह जैसे व्यक्तित्व का विकल्प मान लिया गया. कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि और कौन है इस देश में जो युवा शक्ति की बात करता है. कौन एक नई सोच की बात करता है? पर जरा सोचिये, क्या वो सोच राहुल की अपनी है. ये युवा शब्द महज़ एक शगूफा है और कुछ नहीं. सब इसका अपनी अपनी तरह से फायदा उठा रहे हैं.

कुछ भी हो, राहुल अच्छे हैं, वो काफी कुछ कर सकते हैं लेकिन अभी से ही यह कहना कि वह प्रधानमंत्री बनने के काबिल हैं, जल्दबाजी है. उन्हें थोड़ा वक़्त दिया जाना चाहिए. अगर सोच और नजरिये की बात है तो प्रियंका गाँधी उनसे कहीं ज्यादा संतुलित, समझदार और प्रभावी लगती हैं. मैंने दोनों को टीवी पर ही देखा सुना है. उसी आधार पर यह बात कह रहा हूँ. सच कहा जाये तो राहुल को हम पकने नहीं दे रहे हैं. हम उन्हें चने के झाड़ पर चढ़ा तो दे रहे हैं लेकिन वो बहुत ही खतरनाक है. बाद में पछताना न पड़े, इसका ख्याल अभी करना जरूरी है.

3 comments:

रंगनाथ सिंह said...

लोकतंत्र में राजतंत्र फल-फूल रहा है। खुदा खैर करे।

mini said...

girl ko bilam karne se pahle socho aisa kun hai,,,,
i think ki unke glamor se jada truth ful nature hai jo unhe famus kar raha hai

Jyoti Verma said...

निखिल जी जल्दी ही कांग्रेस पार्टी और राहुल गाँधी का जादू का भ्रम टूट जायेगा , माया के जाल को जैसे जनता जान गयी है वैसे ही राहुल के ग्लैमर भी ख़त्म होगा. आज भी हम दूर से चमकती हर चीज़ को सोना मान लेते है... नया दौर आने में अब देर नही है.... सुन्दर विमोचन और सीन के दूसरा पहलू दिखाया है अपने ...ज्योति

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