Sunday, February 14, 2010

कुछ सवालों के जवाब...


मीडिया को गाली देना एक फैशन भी बनता जा रहा है। लोग अपने पेशों मे क्या कर रहें हैं ? डाक्टर, वकील, नेता, जज क्या कर रहे हैं ?

बीते दिनों मेरी एक पोस्ट के सन्दर्भ में रंगनाथ जी ने ये सवाल किया था. वादे के मुताबिक मैं आज उस सवाल का जवाब देने की कोशिश कर रहा हूँ. हालाँकि उनके सवाल में बहुत बातें हैं जिन्हें सिर्फ शब्दों में बांधने से काम नहीं चलेगा. मैं कोई ज्ञान नहीं दूंगा. जो मैंने देखा, समझा है, उसे ही जवाब में तब्दील करूँगा.

पहला सवाल या आरोप था कि मीडिया को गाली देना फैशन बनता जा रहा है.
मुझे लगता है, जिससे उम्मीद होती है उसकी समालोचना जरुरी है. रविश जी ने बीते दिनों अमिताभ को धोया. आम आदमी किसी न किसी को धोता रहता है. नुक्कड़ कि दुकानों पर होने वाली बतकही में उम्मीद नजर आती है. गाँधी, नेहरु, किसे नहीं गाली दी गईं. जहाँ तक मुझे पता है, सबको. और सभी ने देश को नई दिशा दी. मीडिया से भी काफी उम्मीदें हैं. उनकी तारीफ करते रहेंगे तो बाज़ार कुछ ज्यादा ही हावी हो जाएगा ख़बरों पर. आज ही काफी खबरें न्यूज़ रूम में सिसकियाँ भरती हैं. कल न जाने क्या होगा. लोग अपने हिसाब से काम कर रहे हैं. एक लाइन नहीं बन रही कि समाज के लिए क्या सही और क्या गलत है. मीडिया का काम ओपिनियन लीडर का होता है. ये गलत ओपिनियन न बनाये, इसका ध्यान रखना हमारा काम है. ये भी हमारा दायित्व है.

दूसरा सवाल था कि लोग अपने पेशे में क्या कर रहे हैं?
अक्सर यही सवाल मेरे मन में उठता है. लेकिन इसके साथ ये भी सवाल आता है कि मैं क्या कर रहा हूँ. मैंने क्या किया है? मेरे पास कुछ जवाब मिलते हैं. क्या रंगनाथ जी भी यही सोचते हैं और खुद कुछ जवाब पाते हैं. सवाल समाज के लिए, किसी व्यक्ति विशेष के लिए या देश के लिए कुछ करने का है. व्यक्तिगत तौर पर ही सुधार सबसे कठिन और सबसे बड़ा बदलाव साबित हो सकता है. सबको अपने में सुधार लाना है. भ्रष्टाचार के लिए जितने हम जिम्मेदार हैं, उतना कोई नहीं. हम कुत्ते को ब्रेड खिलाना बंद कर दें तो वो खुद ही दरवाजे पर आना बंद कर देगा. ऐसे ही हालत हर आयाम में हैं. हमें ये सुनिश्चित करना है कि आखिर हम चाहते क्या हैं? आज का छोटा फायदा या सुनहरा भविष्य. आज के छोटे से फायदे के लिए हम देश, समाज और विकास को दरकिनार कर दे रहे हैं, बेच रहे हैं, लेकिन ये नहीं सोच रहे कि हमारी अगली पीढ़ी को भी इसी समाज में जीना होगा. हम अनजाने में, दुलार में या लालच में अपनी अगली पीढ़ी के लिए गड्ढा खोद रहे हैं. इस दौरान कुछ लोग अच्छा कर रहे हैं लेकिन वो सामने नहीं आ रहे, क्यूंकि उन्हें सिर्फ काम से मतलब है. उन्हें काफी काम करना है. लेकिन उन्हें मीडिया की जरुरत नहीं. ज्यादातर लोग जो मीडिया पर दिखते हैं, सबका अपना स्वार्थ है. किसी की संस्था है तो किसी का प्रोडक्ट. अखबारों या टीवी पर जब हम उन्हें प्रकाशित या प्रसारित करते हैं, जो अक्सर पीपी शब्द का इस्तेमाल करते हैं.

तीसरा सवाल था डॉक्टर, वकील, नेता और जज क्या कर रहे हैं?
वैसे वो अपने लिए काफी कुछ कर रहे हैं पर बात तो सही है कि वो समाज के लिए क्या कर रहे हैं. देखा जाये तो सभी किसी न किसी तरह से समाज कि थोड़ी मदद कर रहे हैं. खासकर डॉक्टरों की जमात. मैंने कई डॉक्टरों को देखा है जो गरीब मरीजों का इलाज मुफ्त में कर देते हैं. बाकि वकील और जज के सवाल में दूसे सवाल का जवाब काफी है. और लिखने से बोरियत हो रही है.

मुद्दे की बात महज़ इतनी सी है कि कम से हम आप तो सही काम कर सकते हैं. कुछ लोग फोटो खीचकर ब्लॉग पर चिपका रहे हैं. इससे समाज का क्या भला होगा. अरे इतना वक़्त कुछ गरीब बच्चों को पढ़ा दिया करें तो क्या बुरा है. थोडा पैसा बचाकर स्लम एरिया में एक अदद स्कूल खोल दें तो क्या बुरा है. कुछ नहीं तो फोटो खीचना ही सिखा दें तो क्या बुरा है. हम आप किताबों में घुसे हुए हैं. नेताओं को कुर्सी चाहिए, शिक्षकों को प्रमोशन चाहिए. हमें भी पैसा चाहिए, किसी को शोहरत चाहिए तो किसी को मौका. किसी को हँसता हुआ देश नहीं चाहिए. कुछ लोग किताब लिखने में बिजी हैं. कुछ सिर्फ आलोचना करने में तो कुछ बातें बनाने में. मानता हूँ कि भूखे पेट कुछ नहीं होता, परिवार और कई जिम्मेदारियां हैं लेकिन अगर गाँधी, भगत, आजाद, सुभाष जैसे लोगों ने ये सोचा होता तो आज भी हम विदेशी सल्तनत के गुलाम होते.

मुझ जैसे मूर्ख समझने और समझाने में लगे हैं लेकिन वादा रहा कुछ तो हम भी करेंगे. लोगों से भी यही उम्मीद है. उसके बीच समालोचना भी करते रहेंगे.

4 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

मीडिया को आईना दिखाया जा रहा है. यदि अपने आप को चौथा खम्भा कहलाने में गर्व होता है तो आलोचनाओं से क्यों व्यथित होना. दूसरों की गलती बड़ी होने से अपनी गलती कम तो कही जा सकती है लेकिन खत्म नही हो सकती.

रंगनाथ सिंह said...

मीडिया की आलोचना बिल्कुल जायज है। होनी ही चाहिए। लेकिन सारी बुराईयों की तोहमत मीडिया पर मढ़ देने की मैं मुखालफत करता हूँ। मीडिया को लेकर जो नकारात्मक श्वेत-श्याम तस्वीर बन रही है उससे बचने की जरूरत है। आपने कुछ अच्छे डाक्टरों,वकीलांे,जजों की बात की है। मुझे लगता है उतने अच्छे पत्रकार तो हमारे पास हैं ही। समाज की बेहतरी के लिए आपकी भावना काबिलेतारीफ है। जाहिर है हम एक ही नाव पर सवार हैं।

कुछ लोग सिर्फ मनोरंजन या विलास के लिए लिखते हैं। हम उनमें से नहीं है। मेरे कई साथी ऐसे ही हैं। समानांतर पत्रकारिता में तो ऐसे उदाहरणो की भरमार है। दूसरे पेशों के मुकाबले पत्रकारिता में आज भी आदर्शवादी नौजवानों की बहुतयात है। पत्रकारिता सिर्फ टीवी तक सीमित नहीं है। हमारी जिम्मेदारी है कि हम बुरे के साथ अच्छे पक्ष को भी प्रस्तुत करें। यही न्याय होगा।

आपने तस्वीरों को ब्लाग पर लगाने की बात की हैं। मैंने कभी तस्वीरे नहीं लगाई। फिर भी लगता है कि कई तस्वीरें हमारी समझ को बेहतर बनाती हैं। चीनी कहावत तो मीडिया के शुरुआती कक्षाओं में सुनाई जाती है कि एक तस्वीर हजार शब्दों से ज्यादा बोलती है। जहाँ तक लाभ-हानि का सवाल है,कुछ चीजों का प्रभाव स्भूल होता है,कुछ का सूक्ष्म,कुछ का अति सूक्ष्म।

रंगनाथ सिंह said...

नीचे से दूसरी पँक्ति में 'स्भूल' को 'स्थूल' पढ़ें।

ankahi said...

tasveeron ka jikra aapke liye nahin kiya, jawab aapke jariye sabko dene ki koshish ki hai. Tasveeron ka jikra ravish ji ke liye kiya hai.
Tareef bhut log kar rahe hain. hum aap bhi nav ke usi or baith gaye jahan sab tareef karne wale baithe hain to naav doob jaegi. To, hum idhar hi sahi. jab idhar wajan badhega to udhar bhi aane mein koi dikkat nahin.

nikhil

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