Monday, January 18, 2010

उफ़, ये रामराज की चाह...

जिस पेशे से मेरा ताल्लुक है वो कई राहों पर ले जाता है। कई लोगों से मिलने, बात करने का मौका देता है। लोगों और उनके विचारों से रू ब रू होते हुए काफी प्रभावित होता हूँ। कई बातें काफी असर कर जाती हैं और सोचने पर मजबूर करती हैं, कुछ तो ऐसी होती हैं कि चाह कर भी उन्हें मानने में दिक्कत होती है। मन बार बार उनका विरोध करता रहता है। ऐसी ही एक बात आज सुबह से खाए जा रही है। सोचा जाने दूँ पर रहा नहीं जा रहा है। दरअसल, एक ब्लॉग में झाँका तो वहां आग सी लगी हुई थी... विचारों कि गर्माहट कुछ ज्यादा ही थी। पोस्ट ख़तम होने तक लग गया कि शायद हर युवा ऐसा ही सोचता है। हो सकता है, हमारी तरह वो जाहिर न कर पता हो अपने प्रतिशोध को। फिर अचानक एक सवाल उठा। काहें इतना परेशां हो? ये कलयुग है तो रामराज काहे लाना चाह रहे हो? क्यों चाह रहे हो कि सूरज पश्चिम से निकले? इस युग की यही नियति है? मैंने जवाब दिया...ये बहाना भी तो हो सकता है। पर खुद को संतुष्ट नहीं कर पा रहा हूँ। १ अरब से भी ज्यादा आबादी है, हम जैसे कितने हैं जो वाकई बदलाव के लिए बेताब हैं, पता नहीं। कितने लोग एनडीटीवी जैसे चैनल देखते हैं। सब इंडिया टीवी देख कर मजे लेते हैं। कितने लोग बदलाव की आग को अपने दिल में २४ घंटे भी जलाये रख सकते हैं, पता नहीं। किसी के बच्चे होंगे तो किसी के माँ बाप। किसी का करियर होगा। देश जाये चूल्हे में। लोग यूँ ही मरते रहे सड़कों पर, कुछ लोग चटपटी खबर बनाएँगे...हम कुछ लोगों को गरिया कर टीवी बंद करके सो जायेंगे. एक दिन हमारा कोई यूँ ही मरेगा तो हम उस किसी कि तरह आंसू बहाएँगे। लेकिन फिर वही रामराज की चाह कितनी जायज़ है इस कलयुग में। कुछ कमेन्ट आयेंगे, फिर यूँ ही हो जायेगा सब...पर कब तक...इस सवाल का जवाब खोजना बहुत जरुरी है। जितनी जल्दी हम इसका जवाब खोज लेंगे, उतनी जल्दी हम संतुष्टि हासिल कर सकेंगे...

3 comments:

Jyoti Verma said...

nkhil ji aap bilkul sahi kah rahe hai. aapko pata nhi ki log kitna mean ho sakte hai. aap kal hum bhi isi uhaposh me jee rahe hai ki kyop log is tarh ki zindagi ji rahe hai. kya zarurat hai. hum aap jaise log hi hai jo sach me sochte hai aur apni pareshani lekar baithe nhi rahate hai. duniya ,samaj, deah, ke liye sochte hai.aap isi tarah apnisoch ko aakaar dete rahiye ....

pratibha said...

तेरे सीने में जले या मेरे सीने में जले
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए...
बनिया की दुकान वाली बात नहीं कि ऐसा सोचने का क्या फायदा...और वैसा सोचने से क्या होगा? बात ये है कि कुछ चीजों से मुंह चुराया भी तो नहीं जा सकता. कुछ सवाल जो सोते जागते मथते ही हैं. इन्हीं सवालों में उम्मीद छुपी है. क्यों...है ना ऐसा ही.

Nikhil Srivastava said...

यही तो हम भी कहना चाहते हैं...हमें खुद से सवाल करते रहना है. हो सकता है तस्वीर बदले...बनियागीरी का सहारा जानकर लिया..

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