Tuesday, January 4, 2011

नया साल, नयी सौगात और नयी बात...


दौड़ते-भागते, कहते-सुनते, रोते-गाते, हँसते-हँसाते और पढ़ते-पढ़ाते एक साल फिर गुज़र गया। ज़िन्दगी का एक और अनमोल साल। पूरे तीन सौ पैंसठ दिन बीते, लग रहा है जैसे अभी कुछ दिन पहले ही पिछले साल का पहला पोस्ट लिखा था। आज भी उस दिन लिखी एक एक बात याद है। सच बताऊँ तो इतने दिनों का हिसाब यूँ नहीं रहा क्यूंकि, बीते साल मैं बहुत भगा। यहाँ से वहां, वहां से यहाँ और न जाने कहाँ-कहाँ। साल भर भागता रहा। हर बार दौड़ शुरू करने से पहले एक उम्मीद पाल लेता था। फिर मायूस लौटता और लड़ने की ठानता, फिर भागता और फिर लौट आता। अगस्त में जाकर मेरी दौड़ भाग को रहत मिली। मुझे लगा शायद साल भर की मेहनत का सबब मिल ही गया। बहुत खुश हुआ। सबको ख़ुशी में शामिल भी किया, लेकिन न जाने किस्मत को क्या मंजूर था, शायद कहीं कुछ कमी रह गई। हालत बदले और मैं फिर वापस भागा। इस बार कभी न भागने के लिए। फिर छोटी राहों पर भागने का मन बनाया। भागा भी, चला भी लेकिन दिल को तसल्ली देने में नाकामयाब रहा। फिर लम्बी दौड़ के लिए खुद को तैयार किया। अपने बिखरे मन को जोड़ा और फिर भागना शुरू किया। साल खत्म होते-होते दौड़ सफल होती नज़र आई...इस साल पर पिछले साल का काफी कुछ उधार है। इसे चुकाना तो पड़ेगा ही। यही उम्मीद है, और मैं हमेशा की तरह अपने यकीन और निर्णय पर कायम हूँ।


सपने एक साल बड़े हो चुके हैं। अब उन्हें ज्यादा भूख लगती है। लेकिन सोता कम हूँ, तो दिन में भी उनको खुराक देता रहता हूँ। खुली आँखों से सपने देखना शायद इसे ही कहते होंगे। सपनों की बात से याद आया की पिछले साल की सबसे बड़ी उपलब्धि भी यही रही कि मैंने साल भर खूब सपने देखे और खास बात ये कि उनपर जमकर काम भी किया। मेरे सपनों ने यहाँ से विदेश तक उड़ान भरी। देश के बड़े बड़े लोगों ने सपनों की तस्वीर को सराहा। मेरा और सपनों का मनोबल बढ़ा। इस बीच एक सपने का दुखांत भी हुआ। एक चार साल के युवा सपने की पिछले महीने मौत हो गई। दर्दनाक हादसे में। मैं भी बुरी तरह जख्मी हुआ और उसे बचाने की लाख कोशिशें कीं लेकिन उसे वो दावा न दे सका जो उसे बचा सकती थी। खैर, कब तक शोक मनाता, सपने भी बड़े हो चले थे तो उन्हें समझा बुझाकर आगे बढ़ने को कह दिया। वो मायूस हुए, लेकिन आगे बढ़ रहें हैं मेरे साथ। हमेशा की तरह।


इस साल ''क्या पाया-क्या खोया'' और ''लेखा जोखा'' पर काम भी नहीं किया। बीते साल का काफी हिसाब किताब तो धुंधला पड़ गया है लेकिन कई हिसाब शायद ताउम्र याद रहेंगे। कितना भी खारोचूं उन अधूरे हिसाबों को, मिटने का नाम ही नहीं लेते, बल्कि वो एक जख्म की तरह और ही गहरे हो जाते हैं। शायद वो न मिटने वाले हिसाब ही थे, जो मुझे ज़िन्दगी भर जोड़-घटाना सिखाएँगे। ज़िन्दगी से इतनी शिकायतें हैं कि उसपे एक ग्रन्थ लिख उठेगा सो उसपर बात मैं करता नहीं। सोचता हूँ, खुशियाँ भी यही ज़िन्दगी देगी। हालाँकि आज ये टुकड़ों में मिल रही है, कल हो सकता है पैकेज में मिले। इसलिए फुल एंड फ़ाइनल लेखा जोखा अपनी किताब में ही किया जाएगा।

अब बात पत्रकारिता की, मेरे पास कहने को बहुत कुछ है लेकिन अपने पिछले साल के अनुभव के आधार पर यही कहूँगा कि पत्रकारिता बहुत ही गन्दी हो चुकी है। कोई ही सुथरा पत्रकार बचा है। २०१० में पत्रकारिता के कई दलालों से मैं खुद मिला। बड़े शौक से, बड़े गर्व से अपनी दल्लागिरी सुनाते हैं सब, मन तो करता था कि जूता उतार कर चेहरे का नक्शा बदल दूँ लेकिन....खैर, एक से एक गंदे और घटिया लोगों से पटा हुआ है सो कॉल्ड पत्रकारिता जगत। क्या संपादक और क्या रिपोर्टर। सब जमात एक ही है। जो अच्छे पत्रकार हैं तो वो बहुत ही बेबस हैं। सब किताब लिखने में बिजी हैं। सच पूछिए तो उनके अकेले के बस में किताब लिखने के अलावा कुछ है भी नहीं। उनकी कमजोरी और बेबसी का आलम ये है कि बेचारे न बोल सकते हैं, न सुन सकते हैं। कुछ लोग इसे मेरा फ्रस्ट्रेशन कह सकते हैं, लेकिन वो अपने गिरेबान में भी झांक सकते हैं। कुल मिलकर, अपने अनुज पत्रकारों से मैं यही कहने के लिए बाध्य हूँ कि खूब ज्ञान अर्जित करो, खूब अच्छा लिखो, नयी शैलियाँ इजाद करो, दिन रात मेहनत करने का माद्दा जुटाओ और अगर फिर भी पत्रकार न बन पाओ तो अच्छा चाटुकार बन पत्रकार बन जाओ।


नए साल में काफी कुछ करना है। कई नए आयाम तलाशे हैं काम के। उन पर खासा कर चुका हूँ। कई लोगों से मिला हूँ। सीखा है। केंद्रीय मंत्रियों से लेकर व्यापारियों से भी मिला। और अब जमीन से बदलाव करने की तयारी है। क्या पता ये कोशिश कामयाब हो ही जाये।


पोस्ट खत्म करते-करते एक बात और, अक्सर लोग पूछते हैं कि आजकल ब्लॉग पर सरोकारों की बात नजर नहीं आती? सबको बता दूँ कि सामाजिक सरोकारों की बात करनी बंद कर दी है। ब्लॉग इसका जीता जागता सबूत है। वजह ये है की बातें बहुत होती है, जरुरत कुछ काम होने की है। मैं काम करने की कोशिश कर रहा हूँ। लिखकर मैं भी सो कॉल्ड बौद्धिक नहीं बनना चाहता। जो भी कर रहा हूँ, पूरी ईमानदारी और निष्ठां के साथ कर रहा हूँ। बीते साल पत्रकारिता की दो दो अच्छी नौकरियां छोड़ने का तनिक भी गम नहीं है। ऐसी कीचड़ पत्रकारिता करने से अच्छा है मैं बेरोजगार रहूँ, जो मैं हूँ नहीं। मन था कि रेजोलयूशन जैसी बकवास बातें नहीं करूँगा फिर भी इस साल से एक ही वादा है कि कुछ अलग करूँगा। आम आदमी के लिए कुछ अच्छा करूँगा। विकास के पथ पर मैं भी एक मील का पत्थर रखूँगा...

Wednesday, December 15, 2010

कभी...

कभी, दिल कुछ भी सुनता नहीं,
जब है जरूरी तभी
तब रोता है फिर कभी...

कभी...ये सांस रुक जाएगी
गर वो जो खो जाएगी
तब होगी गम की ख़ुशी

ओ कभी, मिल जाएगी जिंदगी
जब आएगी हर ख़ुशी
तब होगा हर पल हसीं...

कभी...वो दिन भी आ जायेगा
जब सब सुधर जाएगा
तब दिल भी मिल जाएगा

कभी, मैं दिल को समझाऊंगा
बस कर भी दिल की लगी
चोट तुझको है कल लगी...

फिर कभी, मैं दिल से बतलाऊंगा
जल जाने दे मुझको भी
गर ऐसी है ज़िन्दगी...

Thursday, December 9, 2010

...आखिर हमनें ऐसा क्या किया

लम्हे पकड़ते, कुछ तुमसे कहते
पहले ही तुमने हमें भुला दिया
आखिर हमनें ऐसा क्या किया

ज़िन्दगी साथ बुनते, वक़्त की धुनें सुनते
पहले ही तुमने मुंह मोड़ लिया
आखिर हमने ऐसा क्या किया

बागबां बनाते, सपने सजाते
पहले ही तुमने ना कह दिया
आखिर हमने ऐसा क्या किया

कितने रतजगे, कितने फलसफे
पल भर में तुमने सबको भुला दिया
आखिर हमने ऐसा क्या किया

कितनी कशिश, कितने रंजोगम
फिर से तुमने यूँ सहला दिया
आखिर हमने ऐसा क्या किया...
-----------------निखिल श्रीवास्तव

Sunday, December 5, 2010

...झूठ बोलकर

मैं सच की रौशनी बिखेरने में ही लगा रहा,
तमाम लोग बन गए महान झूठ बोलकर।

मेरी ख़ुशी बिछुड़ कर मुझसे चैन कैसे पा गई,
किसी ने भर दिए थे उसके कान झूठ बोलकर।

बढ़ा न पाया कोई अपनी शान झूठ बोलकर,
मगर वो छू रहें हैं आसमान झूठ बोलकर।

कभी तो सच्ची बात कर, कभी तो सबसे प्यार कर,
चली है किसकी उम्रभर दुकान झूठ बोलकर।

हकीक़तों से मुंह मोड़ने का मशविरा न दो मुझे,
तुम ही चलाओ अपना खानदान झूठ बोलकर।
(महेंद्र कुमार श्रीवास्तव)

जनता हूँ सच नहीं बोल पाओगे,
हमें मत बहलाओ झूठ बोलकर।

बड़ी बड़ी बातें कहते हो हर जगह,
इतिहास तो मत बनाओ झूठ बोलकर।

किसी को तनहा छोड़ने से पहले,
अपना तो न बनाओ झूठ बोलकर।

हाथ की लकीरें रातों रात नहीं बदलती,
हमें नींद से न जगाओ झूठ बोलकर।
(निखिल श्रीवास्तव)

Sunday, November 14, 2010

प्यार, अधूरा मैं और समाज



समाज शब्द से नफरत सी होने लगी है। इसने मेरे सारे सपनों को बिखेर दिया है। इसे ऐसा करने से रोकने की कोशिश बहुत की लेकिन सारी कोशिशें नाकाम जाती रहीं। इसीलिए आज बहुत से सवाल हैं। जवाब नहीं मिल रहा और न ही कोई रास्ता नजर आ रहा है जो मेरी दुविधा के हल से मुझे मिलाये।

ये कैसा समाज है? ये किसका समाज है? और इस समाज का क्या काम है? ये समाज किसे क्या देता है? इस समाज से किसका कितना जीवन संवरता है? प्रेम का ठेकेदार क्यूँ है ये समाज? समाज के सामने प्रेम क्यूँ हारने लगता है? हम समाज के निरर्थक और दकियानूसी तानों से बचने के लिए क्यूँ अपने बच्चों की खुशियों का गला ख़ुशी ख़ुशी घोंट देते हैं? और ऐसे मां बाप को क्या संज्ञा दी जानी चाहिए जो प्रेम विवाह रोकने के लिए अपने बच्चों को जान से मार देने पर उतारू हो जाते हैं ?

उस लड़की का क्या कसूर है जो अपने मां बाप की ख़ुशी के लिए अपनी ज़िन्दगी कुर्बान कर रही है? उस लड़के का क्या कसूर जिसने अपनी प्रेमिका को ही धड़कन समझ लिया? उस लड़के का क्या कसूर प्रेम को प्रथाओं से ऊपर समझा? दोनों का क्या कसूर जो उन्होंने समझ लिया कि वक़्त के साथ लोगों की सोच भी बदल जाती है? और दोनों के जुदा हो जाने से समाज को क्या मिलेगा? क्या समाज वाह वाही करेगा उस मां बाप की? सम्मानित करेगा उस परिवार को जिसने एक अंधे और बहरे समाज के लिए दो जिंदगियों का गला घोंट दिया?

किसे दोष दूँ, ये भी मैं समझ नहीं पा रहा हूँ. दिमाग सवालों का घर बन गया है। प्रेम के सुनहरे ख्वाबगाह को तहस नहस होते देखना कितना दुखदाई है इसे बयां करना भी बेहद मुश्किल है। भावनाओं के सामने शब्द इतने अदने लग रहे हैं कि उन्हें लिखने का भी मन नहीं। लेकिन क्या करूँ, इस समाज को ऐसे ही प्यार का क़त्ल करते और नहीं देख सकता। आज मैं समझ सकता हूँ विरह क्या है। आज मैं महसूस कर रहा हूँ कि वियोग क्या है। और कतई नहीं चाहता कि प्रेम यूँ ही घुट घुट कर मरता रहे। वो भी एक ऐसी सोच के सामने जिससे किसी का भला नहीं। जो सिर्फ और सिर्फ नफरत और दर्द को जन्म दे वो सही कैसे हो सकता है? कब तक हम समाज की व्यर्थ रुढियों के सामने घुटने टेकते रहेंगे। आखिर कब तक...

सुना था प्रेम बहुत शक्तिशाली होता है। पर क्या यह इतना कमजोर होता है जितना की आज मुझे प्रतीत हो रहा है...

Saturday, September 25, 2010

कॉमनवेल्थ न कराकर देश की तस्वीर बदल सकते थे...

एक बार इनसे पूछा होता कि उन्हें बेटन चाहिए या अच्छी एजुकेशन।

शर्म नहीं आई इन्हें देश की इज्जत को मिटटी में मिलाकर

ये बच्चे जवाहर लाल नेहरु स्टेडियम के बाहर हैंइनकी शिक्षा के बारे में ही सोचा होता

कॉमनवेल्थ गेम्स चर्चा में है पहली बार भारत में हो रहा है करीब सत्तर हज़ार करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं ख़ास बात ये है कि ये अब तक का सबसे महंगा कॉमनवेल्थ गेम है इसमें हो रहे घोटाले भी उजागर किये जा रहे हैं आएदिन सवाल उठ रहा है कि क्या भारत ये खेल कराने के लिए तैयार था ऐसे ही सवालों ने सोचने पर मजबूर किया कि क्या इस वक़्त की सबसे बड़ी जरूरत कॉमनवेल्थ गेम्स ही थी? क्या यही एक तरीका है जिससे हम आज विश्व पटल पर अपना नाम सुनहरे अक्षरों में अंकित करवा सकते हैं (सभी जानते हैं कि हमें कितनी प्रसिद्धि मिल रही है इस आयोजन के लिए) ? क्या और तरीके नहीं हैं विश्व के सामने एक मिसाल बनकर उभरने के? क्या सुरेश कलमाड़ी, ललित भनोत और चंद लोग इतने ताकतवर हैं कि सरकार इनके आगे नतमस्तक होकर हाँ में हाँ मिला देती है? क्या ऐसे ही लोग तय करेंगे हमारे देश का भविष्य?

हर दिशा से इन सारे सवालों का जवाब एक ही आता है...कतई नहीं। पूरा विश्व जनता है कि हम एक विकासशील देश हैं। आज जरूरत है अपने आधारभूत ढांचे को मजबूत करने की। गेम्स कहीं भागे नहीं जा रहे हैं। चार या आठ साल बाद हम दमदार तरीके से गेम्स को घर लाते (बिना दूसरे देशों को पैसे दिए) तो क्या दिक्कत थी। इस बीच हम शिक्षा पर अगर इतना ही पैसा खर्च करते और इनती ही तेजी से काम करते जितना आजकल गेम्स और भारत की लाज बचने के लिए सरकार कर रही है तो हम बहुत बेहतर स्थिति में होते।

प्राथमिक शिक्षा का क्या स्तर है, ये किसी से छिपा नहीं है। सोचा जा सकता है कि (2009-10) में शिक्षा का निर्धारित बजट इस गेम के आयोजन की राशि का आधा भी नहीं है ( 31,036 करोड़ रुपये)। इतने पैसे से हम शिक्षा की तस्वीर बदल सकते थे, पर ऐसा नहीं किया गया। कभी ये नहीं सोचा गया होगा कि हमारे देश में एमआईटी, कैम्ब्रिज और हार्वर्ड जैसा शिक्षा संस्थान क्यूँ नहीं है। सिब्बल साहब ने नहीं सोचा होगा कि विज्ञान के क्षेत्र में आखिर हम अग्रिणी क्यूँ नहीं बन पा रहे? क्यूँ हमारे देश के अव्वल युवा विदेशों के नौकर बनना पसंद करते हैं? क्यूँ हम शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी और मजबूत नहीं बना पा रहे? क्यूँ ये नौबत आती है कि अचानक हमारी कुम्भकरणी नींद टूटती है और हम फरमान जारी कर देते हैं ४४ डीम्ड विश्वविद्यालयों की मान्यता रद्द कर देने का? क्यूँ हम नहीं सोचते कि केवल १५% बच्चे ही हाईस्कूल क्यूँ जा पाते हैं? बाकी ८५% बच्चे कहाँ हैं? यूनेस्को की रिपोर्ट क्यूँ कहती है कि ''India has the lowest public expenditure on higher education per student in the world''? क्यूँ हम दुनिया को देखकर भी सबक नहीं ले पा रहे। इन सभी सवालों का जवाब था हमारे पास, लेकिन तब एक ऐसे गेम को रास्ता दिया गया जिसका कोई आधार ही नहीं था अपने देश में। सारा पैसा चंद लोगों के पेट रूपी गटर में गया और हम फिर वहीं के वहीं खड़े रह गए। चंद दिनों के खेल के बाद कुछ दिनों तक हिसाब किताब किया जाएगा। मुनाफा और घटा गिनाया जाएगा और फिर शुरू हो जाएगा हमेशा की तरह रोना। हमारे पास संसाधन नहीं हैं, कहकर नेता पल्ला झाड़ लेंगे। मीडिया चीखता रहेगा। पर क्या फरक पड़ेगा? कुछ नहीं। एकदम नहीं।

अगर ईमानदारी से शिक्षा की उन्नति के लिए प्रयास किया जाता तो सत्तर हज़ार करोड़ से कहीं कम में हम गाँव गाँव की तस्वीर बदल देते। जो पैसा बचता उससे कम से कम एक चौथाई देश में स्वास्थ्य की उन्नत सुविधाएं मुहैया कर ली जाती. उसका फायदा भले ही हमें तुरंत नहीं मिलता लेकिन हम जल्दी ही दुनिया के अग्रणी देशों से कन्धा मिला लेते, लेकिन फिर वही बात आ जाती है। फायदा। सबको तुरंत फायदा चाहिए था। देश की फिक्र किसी को थी ही नहीं।

मैंने बहुत ही सतही तौर पर कॉमन ''वेल्थ'' गेम्स के आयोजन की तुलना अपने देश की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता से की है। इसपर एक ब्रॉडशीट अखबार के कई पन्ने भरे जा सकते हैं। न जाने हम और क्या क्या कर सकते थे। लेकिन...
अब पछताए होत क्या, जब सिस्टम चुग गया देश हैट्स ऑफ टु आवर सिस्टम जय हिंद, जय भारत

(यहाँ ये साफ़ कर देना चाहता हूँ कि मैं इन गेम्स का विरोधी नहीं हूँ। मेरा विरोध इस लिए है क्यूंकि ७० हजार करोड़ मामूली रकम नहीं। इस पैसे का दुरुपयोग होते हुए कोई भी भारतीय नहीं देख पाएगा. जो लोग कलमाड़ी और लुटेरे नेताओं की सोच से प्रभावित हैं, उन्हें कुछ भी सोचने की इजाजत है।)

Sunday, September 19, 2010

उत्तर प्रदेश का एक गाँव..नाम गुम गया


कल पूरा दिन उत्तर प्रदेश के एक गाँव में गुजरा। शहर की सड़कों से गुज़रते हुए मैं बेसब्री से गाँव के खड़न्जों वाली सड़क और पगडंडियों का इंतज़ार कर रहा था। वो मिलतीं उससे पहले ही मेरी तमन्ना पूरी होने लगी। लेकिन गाँव अभी काफी दूर था। मीलों तक का सफ़र खडंजानुमा सड़क पर जारी रहा और फिर एक गाँव आया। लोग हमें देखते ही कयास लगाने लगे कि हम या तो सरकार की तरफ से आये हैं या किसी प्रधान के प्रचार के लिए। खैर, हमारा काम एकदम अलग था।

हमने उनसे बातचीत शुरू की, उन्हें अपना मकसद समझाया और चल दिए गाँव के भीतर। हमें एक एक घर जाना था, परिवार के लोगों से बात करनी थी और कुछ तथ्य जुटाने थे। लोगों से बातचीत शुरू हुई, कुछ लोग बहुत खुश हुए तो कुछ हमें समझना ही नहीं चाहते थे। ऐसे दुत्कारा मानो हम कोई सरकारी मुलाजिम या किसी पार्टी के प्रचारक थे। उनका गुस्सा जायज़ था, इसलिए हम सुनते और समझाते रहे। मैं गाँव के दूसरे सिरे की ओर चल दिया, वहां कई घरों में गया। वहीं एक प्रधान के उम्मीदवार का भी घर था. वो भी इत्तेफाक से मिल गया. उससे भी बातचीत की. वो बात कमोबेश जल्दी समझ गया. फिर शुरू हुआ पूछताछ का सिलसिला. उसकी पत्नी का नाम पूछा तो बेटा भी तपाक से बोल पड़ा, लेकिन तब तक बाप कुछ और नाम बता चुका था। दोनों एक दूसरे को देखने लगे, और मैं उन दोनों को देखने लगा. समझ नहीं पाया कि माज़रा क्या है. वजह पूछी तो बताया गया, नाम बदल लिया। फिर सवाल किया तो सकुचाते हुए उस ग्रामीण ने कहा कि वोटर लिस्ट में जो नाम आया है वही रख दिया है मालकिन का नाम।

खैर, मेरे समझाने का कोई फायदा नहीं था, सच तो ये था कि महिला का नाम ३५ साल कि उम्र में बदल चुका था। अब वो भी खुद को नए नाम से ही पहचानने की कोशिश कर रही थी। आगे बढ़े तो ऐसे कई मामले सामने आये। प्रदेश और देश में गाँव की तस्वीर साफ़ नजर आने लगी। ये भी समझ में आ गया कि आखिर इसके पीछे वजह क्या है, और कौन जिम्मेदार है. गाँव के ही एक साथी से पूछा तो उसने कहा कि, गाँव वालों को तो जानकारी नहीं है, लेकिन जिन्हें इस बात की जानकारी थी वो भी तो प्रधानों के घर बैठकर गलत सलत नाम लिख जाते हैं। अब जो नाम वोटर लिस्ट में आ गया वही नाम हो गया।

अँधेरा गहराने तक मेरा काम और गाँव की यात्रा भी तो खत्म हो गई, साथ के एक पत्रकार से कहा कि अपने जिले संवाददाता से ये खबर करने को कहिये। उन्होंने भी बड़ी गर्मजोशी से मंजूरी दी लेकिन एक सवाल बार बार उठता रहा कि उसके खबर लिखने से भी क्या होगा? ऐसे कितने लोग होंगे यहाँ जिन्हें अपना असली नाम याद होगा? कितने ऐसे होंगे जिन्होंने अपना सही नाम हमें नहीं बताया होगा? कितने गाँव के लोग अपना नाम बदल चुके होंगे? हो सकता है अगले सेन्सस में फिर नाम बदल जायें। कोई कमलावती, इरावती बनकर फिर राजकुमारी बन जाए।
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