बात जब भी लड़कियों पे पड़ने वाली निगाह कि होती है तो न जाने क्यों मेरे दिमाग में अपनी ज़िन्दगी के वो बारह साल फिर से गुजरने लगते हैं जो सरस्वती विद्या मंदिर बिताये. खूब संस्कार कि बात कि जाती थी वहां, हमने सीखे भी बहुत से. पर एक सवाल हमेशा सिर उठाने लगता है कि क्या ये सीख पाए कि एक लड़की क्या होती है. उससे कैसे बात कि जाती है...दोस्ती नाम कि भी एक चीज़ होती है. उन संस्कारों का क्या फायदा जब आप यही न जान पाएं कि दुनिया कि सबसे अनमोल चीज़ यानि स्त्री की विवेचना कैसे की जाये. मैं वो दिन कभी नहीं भूल सकता जब पहली बार हमारे टीचर्स ने बताया था की हाई स्कूल में को एजूकेशन होगी. हम ख़ुशी कम मना रहे थे, नर्वस ज्यादा थे. समझ नहीं आ रहा था कि कैसे रिअक्ट करेंगे. खैर, पढाई पूरी करने के बाद दुसरे स्कूल में दाखिला ले लिया, वहां भी को एजूकेशन नहीं थी. ख़ास फर्क नहीं पड़ना था क्यूंकि उन दो सालों में खासा मेहनत करनी थी. फिर लखनऊ विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और सीखा कि लड़कियों से कैसे बात चीत की जाती है. पहले साल तो काफी दबे दबे से रहे. फिर कई बदलाव आये. खैर, विषय से भटक गया. आज भी जब पुराने दोस्तों से बात होती है तो एक बात सब कहते हैं..यार ज़िन्दगी में एक गर्ल फ्रेंड की कमी है बस...कुछ तो ये भी कह देते हैं...बनवा दो. मनो कोई दलाल हूँ. फिर सोचता हूँ कि भला उनकी क्या गलती है. घर वालों से कुछ कह नहीं सकते, मोहल्ले में किसी लड़की से नज़रें मिला नहीं सकते, सो सड़कों पर ही लड़कियों के पीछे घूमकर खुद को खुश कर लेते हैं. ये उनकी मजबूरी भी है और उनके आस पास का माहौल भी. कभी हद तक सोच के इस पिछडे होने कि वजह उनकी वो ग्रूमिंग है. जब तक ऐसा सिस्टम रहेगा, लोग यूँ ही नज़रों का इस्तेमाल करते रहेंगे. और ये हालत खासकर यूपी और बिहार जैसे प्रदेशों में ही है. जहाँ लड़कियों के साथ पढने से लड़के बर्बाद समझे जाते हैं और लड़कियों के साथ भी ऐसा ही है. इसीलिए जैसे ही आजादी मिलती है, लोग मुनेरका के मामले जैसी हरकतें करते हैं,शायद ज़िन्दगी भर एक नॉन को एजूकेशन स्कूल में बिताने वालों के साथ ये स्थिति ज्यादा आती है. मैं उन दोस्तों से माफ़ी मांगते हुए ये बताना चाहता हूँ की कुछ तो वेश्याओं तक पहुँच चुके हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें एहसास नहीं हुआ की लड़की शारीरिक संतुष्टि के अलावा भी मायने रखती है...





