Friday, October 2, 2009

मजबूरी का नाम गाँधी

गाँधी जयंती है आज, हर अखबार और टेलिविज़न चैनल अपने तरीके से बापू की जिंदगी में झाँक रहा है। किसी ने युवाओं से जोड़ा है तो कोई उनकी उपलब्धियों का बखान कर रहा है। दोनों ही तरीके सही हैं। तर्कसंगत भी। शायद प्रासंगिक नहीं। मुझे तो कम से कम ऐसा लगता है। आख़िर हम साठ साल से भी ज्यादा समय से कुछ ऐसी बातें उनकी हर जयंती पर करते आए हैं। यही सोच कर मैंने अपने दफ्तर में गुजारिश की कि क्यों न इस बार किसी और पहलु पर बात कि जाए। मेरे दिमाग में बचपन से एक बात भरी थी...मजबूरी का नाम गाँधी। किसने, कब और कैसे भरी ये बात मेरे दिमाग में, मुझे नहीं पता, मैं जानना भी नहीं चाहता पर हाँ ये जरुर जानना चाहता हूँ कि आख़िर ये बात बनी कैसे। मेरे जैसे कितने ही युवाओं ने इस बात को सैकड़ों बार दोहराया होगा पर शायद ही किसी ने सोचने कि कोशिश कि हो कि आख़िर ऐसा क्यूँ है। मैंने सोचा कि इस पर एक स्टोरी होनी चाहिए। बॉस को पसंद भी आया। स्टोरी में क्या लिखा जाएगा, इस पर बात हो गई। कल मेरा वीकली ऑफ़ था सो मैंने घर पर था। आज सुबह का बेसब्री से इंतजार था कि हम आज कुछ अलग करेंगे, पर अखबार देखा तो मूड ख़राब हो गया। याद आए बापू शीर्षक लगा था पहले पन्ने पर, अन्दर के पन्ने खोलकर पढने का मन ही नहीं किया। हम जरा भी अलग नही करना चाहते हैं । जब उसके बारे में कुछ अलग लिखने से डरते हैं तो जिंदगी में उनके जैसा काम क्या ख़ाक करेंगे. सबसे बातें बुनवा लीजिये, आसमान बुन देंगे. पर ढेला भर काम नहीं किया जाता. ये पूरे समाज की समस्या है. कोई आगे नहीं आना चाहता, खासकर किसी ऐसे काम के लिए जिससे कोई भलाई हो सके. सबको पैसा भरना है बस. जहाँ पैसा मिलेगा वहां नंगे नाचने को भी तैयार हो जायेंगे.
दरअसल कोई गाँधी को जानना नहीं चाहता, बस उन्हें गरिया कर सबका मन भर जाता है। सब सुनी सुने बातों पर यकीं कर लेते हैं। कभी ये सोचने की कोशिश नहीं की जाती कि आख़िर कब तक हम यूँ ही सिर्फ़ कही सुनी बातों को अपनी अगली पीढी को देते रहेंगे। हमारे पास एक अच्छा मौका था, हमने गवां दिया। खैर, गाँधी जयंती पर असल गाँधी को जान लिया जाए, इससे बड़ी बात और कुछ नहीं हो सकती। फ़िर वो कोई भी हो, बापू भी खुश हो जायेंगे। उसकी आत्मा को शान्ति मिल जाएगी।

मैं गाँधी भक्त नहीं हूँ। लेकिन मैंने भी उनको अपने बचपने में काफी गरियाया है। जब सोचा कि क्यूँ गरियाता हूँ तो उनके बारे में पढ़ा है। अलग अलग मतों को पढ़ा है, और काफी हद तक उनको समझा है।

5 comments:

rajiv said...

मेरे मित्र दरअसल शीर्षक याद आए बापू.....का मतलब मजबूरी में याद आए बापू ही है. अब आप इसे मजबूरी का नाम महात्मा गांधी कहें या कुछ और. हेडलाइन में अक्षरों की सीमा की भी मजबूरी होती है. अखबारी दुनिया में अक्सर आगाह किया जाता है कि हमें टेबुल रिपोर्टिंग से बचना चाहिए. ऐसा अक्सर होता है कि सुबह जो प्लान किया जाता है, फील्ड में जाने पर रियलिटी कुछ और ही नजर आती है. ऐसे में जबरन उस स्टोरी को सोची दिशा में खीचने पर टेबुल स्टोरी का खतरा बढ़ जाता है. रिपोर्टिंग टीम जो इनपुट लेकर आई उसमें गांधी का मतलब था छु्ट्टïी, गांधी का मतलब था मुन्नभाई वाली गांधीगिरी, गांधी का मतलब था फेैशन लेकिन थोड़ा डिफरेंट. गांधी उनके हीरो थे लेकिन अलग कारणों से. गांधी साहित्य कम ही लोग पढ़ते हैं लेकिन माई एक्सपेरिमेंट विद ट्रुथ लोग इस लिए पढऩा चाहते हैं क्योंकि यह बेस्ट सेलर है. अब यहां 'बेस्टसेलरÓ की बहस में नही पडऩा चाहता. बेस्ट सेलर तो जसवंत सिंह की जिन्ना भी है. आज गांधी के थॉट नहीं, गांधी का नाम बिकता है अब यह चाहे टी शर्ट पर हो या फिल्म में. आज गांधी जयंती के दिन दोपहर शहर में संडे जैसा सन्नाटा है. मुझे लगा कि रिपोर्टर के इनपुट सही थे. लोग हफ्ते में दूसरी बार संडे मना रहे हैं गांधी की बदौलत. हो सकता है शहर के कुछ सभागारों में मुट्ठीभर लोग गांधी पर चर्चा कर रहे हो, हो सकता है कुछ लोगों ने सुबह गांधी की प्रतिमा पर फूल चढ़ाए हों, हो सकता है शाम को कुछ लोग उनकी प्रतिमा पर कैंडल भी जलाएं लेकिन ये भी सच है कि आज शाम मॉल्स में भीड़ कुछ ज्यादा होगी, रेस्त्रां में लोग कुछ स्पेशल खाएंगे और ये भी सच है कि आज मैं देर से उठा क्योंकि आज छुट्टी है, क्योंकि आज गांधी जयंती है.

Priya said...

hey nik....

i really appreciate ur words dear and fully go by each of it. Its really sad when people instead of bestowing a helping hand towards u, go away by turning their faces back. but one thing is for sure that watever u wanted to convey thru ur article, which wasnt publised due to any damn reason doesnt make any difference to me or any one else coz the thing u wanted to bring forth towards us has come this way thru ur blog n beleive me no one can stop u from letting ur ides out... its ture that obstacles will always be there in ur path but u have to find out the way out of that obstacle, so never give up n keep on making efforts to achieve ur goal no matter wat it is..


gud luck.....
best wishes :)

पंकज said...

गांधी को गरियाना अधिकार मानते हैं लोग, बिना गांधी को जाने.
गांधी से शिकायत रहती है कि उन्होंने ये नहीं किया, वो नहीं किया, इनके लिये नहीं किया, उनके लिये नहीं किया.
भाई! उन्होंने जो किया, जिसके लिये किया उसके लिये उन्हें प्रणाम कर, जो बचा उसे हम नहीं कर सकते.

Nikhil Srivastava said...

ye baat agar sab samajh jaein to samajhiye samaj me burai khud ba khud ghatne lagegi...

Ajayendra Rajan said...

abey khali-peeli tension lete ho...itna dimag kahe lagate ho...ho naukar ek dukan ke aur badlav ki hunkar bharte ho...badlav leader late hai hum naukar nahi...bigul bajao shauk se badlav ka magar shart ye hai ki fir kaam lagne ki fikr na karna...kyonki aaj tumme aur tumhari us soch ko jameeni hakikat tak na pahunchane wale k beech koi antar nahi...
wada raha hum khade milenge sath me...

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