Thursday, October 8, 2009

फ़िर याद आ गया वो बचपन

आज फ़िर गली में बच्चों के खेलने की आवाज़ आई
और हमको याद गया वो बचपन
जब हम...
कभी चिल्लाते थे, कभी गुनगुनाते थे
बचपन के आसमां पर, तारों से झिलमिलाते थे
गिरते थे, उठते थे और झट से मुस्कराते थे
भैया की आंखों से अपने आंसू छिपाते थे
पापा की पॉकेट से पैसे चुराते थे
मम्मी को चुपके से जाकर बताते थे
एक के सिक्के को हफ्तों चलाते थे
खो जाता था तो आंसू बहाते थे
छोटे को सताते थे, भूत से डराते थे
फ़िर, मम्मी की गोदी में ख़ुद सो जाते थे
हर रात परियों से मिलने हम जाते थे
उठकर सुबह बड़े से टब में नहाते थे
बारिश में जब हम कश्ती बनाते थे
मोहल्ले भर में नाव चलाते थे
आज याद आ गया वो बचपन
मास्टर जी के आने से पहले हम जब
रोज सोने का बहाना बनाते थे
आज फ़िर याद आ गया वो बचपन
जब हम जो थे वो ही नज़र आते थे ....

4 comments:

Udan Tashtari said...

बचपन याद करना भी कितना सुखद होता है...

अजय कुमार झा said...

हां सच है कि बचपन अनमोल होता है ...और इसे बखूबी उकेरा आपने अपनी रचना में

mehek said...

kuch yaadein kabhi nahi bhulti sunder kavita.bachpan mein le gayi.

baua said...

ur words creates the visual presentation in my mind.....
Very nice piece of writing

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