Wednesday, December 30, 2009

मंजिलें और भी हैं...

किसी ने कहा आशुतोष जी ने हिंदुस्तान में जमकर अपनी पीठ थपथपाई है. जरा पढिएगा. आज सुबह उठते ही २८ दिसम्बर का हिंदुस्तान निकाला और पढने लगा. आखिरी लाइन तक पहुँचते पहुँचते कई सवाल कुलबुलाने लगे थे. सोचा आखिर कब हम अपनी पीठ थपथपाना बंद करेंगे. खुद को शाबाशी देकर क्या करेंगे. २६\११ में तो सबसे पहले कि होड़...किसी नए सुराग में तो सबसे पहले कि होड़. आखिर कब हम देश को देश समझेंगे..कब इसे बाज़ार समझना बंद करेंगे. आखिर क्यूँ हम नक्सालियों के बीच जाकर उनसे बात करके ये कहते हैं कि ये खबर सिर्फ हमारे पास है, क्या यही है मीडिया का काम, क्या सही कर दिया हमने सिस्ट. अभी तो रुचिका को ही न्याय पूरी तरह नहीं मिला है, क्या इतना ही था हमारा काम. मैंने कभी सोचा नहीं था कि ये एक पेशा है, हम लोगों तक लोगों के बीच कि खबरें पहुंचाते हैं तो किसी पे उपकार नहीं करते हैं. पत्रकारिता का लक्ष्य इतना छोटा भी नहीं होना चाहिए जितना आशुतोष जी के लेख में लगा. अभी कई मील के पत्थर रखे जाने हैं. काफी काम हुआ है, इसमें कोई दो राय नहीं. पर यह भी सच है कि अभी तो सफ़र कि शुरुआत भर है. इतनी जल्दी खुश होना शायद ठीक नहीं. हमें इस लोकतंत्र को संभालना है. अपनी दीवार में दीमक नहीं लगने देने हैं (जो कि काफी हद तक लग चुके हैं). यह भी सच है कि देश के हर कोने में कैमरा और कलम नहीं पहुँच सकती पर क्या यह नामुमकिन है. जगह की वाकई कमी है, पर न्याय पर हर भारतीय का हक है. देश को कोसना और कोसते रहने भर से काम चलने वाला नहीं है, वो पान कि गुमटियों पर खड़े लोगों को ही करने दीजिये तो बेहतर होगा. अभी हमारी मुहिम पूरी नहीं हुई है, पहले इसे अंजाम तक पहुँचाना है. और ये भी सोचना है कि हमें १९ साल क्यों लग गए हरियाणा कि एक रुचिका को खोजने में जबकि उसका शोषण और किसी ने नहीं सूबे के कप्तान ने ही किया था. वो मर जाती है, १९ साल बाद उसकी दोस्त कि मेहनत रंग लती है. राठोड़ को थोड़ी ही सही पर सजा मिलती है और वो कोर्ट से मुस्कुराते हुए निकलता है. क्यूंकि उसे पता है, कानून और राजनेता उसकी जेब में हैं. वो हँसी हमारे हलक में फंस जाती है...और हम उसकी पोल खोल देते हैं.. लेकिन जरा सोचिये ऐसी कितनी ही रुचिका हैं जिनकी सिसकियाँ एक कमरा भी नहीं भेद पातीं..उनका क्या होता है...लोग कुछ भी कह देते हैं लेकिन उन्हें न्याय कि आस दूर तक नजर नहीं आती...ऐसे राठोड़ हमारे बीच हैं. हमारे भी भीतर हैं...उन्हें मार पाए तो जानिए उस लड़की को इन्साफ मिलेगा जिसकी गवाह वो खुद न होगी. ये हमारे लिए वाकई शर्म की बात है और सोचने की भी कि आखिर वो आज जिन्दा क्यों नहीं है जबकि उसके साथ हम सब खड़े हैं. शायद उसे १९ साल पहले इस साथ कि कहीं ज्यादा जरुरत थी जब उसे स्कूल से निकाला गया था, जब उसके भाई को दरिंदगी से पीता गया था और जब उसके पिता को नौकरी से हाथ धोना पड़ा था. अब राह बनानी है, उसपर ताउम्र सफ़र करना है. आशुतोष जी आपको तो हम जैसे युवाओं के लिए नजीर पेश करनी चाहिए, इस तरह की बातों में उथलापन झलकता है, हमें तो गहराई तक पहुंचना है, नहीं तो हममें और पान की दुकान पर सिस्टम को गरियाकर आँखें मूँद लेने वाले में क्या अंतर रह जाएगा.

7 comments:

rajiv said...

Dear Nikhil aap ne to man ki baat kah di. Abhi lambi chaudi baat akrne wale us samay kahan the. Mana ki tab itane TV channel nahi the, lekin akhabar to the, NGOs to the jo is samay mashal liye agua bane huye hain sab se aage main ki tarz per. Theek hain kisi ki dukan chalti rahe lekin isase aghr 19 saal baad hi nyay milta hai to vo bhi manjoor.

Priya said...

Ye insaaf nahi hai....Nikhil desh ki nyaay vyavstha par karara thappad hai ......ki dekhiye..judiciary kitni bebas kitni lachaar hai.....aur Rathor bail par choot jaata hai.....Media ko TRP se chuuti milegi tab na mukhya muddo par baat hogi.....abhi to media khabar baich raha hai......Arushi ka kya hua......barso lagenge usko bhi...nyaya paane mein

pratibha said...

राठौर सिर्फ एक व्यक्ति नहीं है मानसिकता है. कहीं भी, किसी भी चेहरे के पीछे वो हो सकती है. कोई भी रुचिका, प्रिया, मोना...शिकार हो सकती है. हो ही रही है. बहुत ठीक बात कही निखिल तुमने हमें हर राठौर को आइडेंटिफाई करते हुए उसके हौसले को पस्त करना है. इस राठौर को तो 19 साल बाद सजा मिल रही है लेकिन उन राठौरों का क्या जो आस पास टहल रहे हैं नाम व चेहरे बदलकर...मुस्कुराहटों के साथ. इस पूरी सोच को उखाड़ फेंकना है. यकीनन इसमें कानून से बड़ा रोल हमारा है. हर इंडीविजुअल का. युवाओं से ही उम्मीद है. तुम्हारे लेख से उम्मीद बंधती है.

Ajayendra Rajan said...

kya baat hai...ladka bara ho gaya lage raho india...

Jyoti Verma said...

bada achchha laga apki soch ko padka. hum fir kahna chahate hai aap jaise youth ki hi desh ko zarurat hai. lage raho aiser hi.....

Panchi said...

nice thought acha lga ye dekhker suruaat he badlav ki hope apki ye surat jo abhi sirf apki he sabki ho jaye soch me badlav ki suruaat system me badlav ki suruaat............keep it with ur work u surely got success bcoz everynoe want this.....so they will be with u aj nhi toh kal

Panchi said...
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