Friday, March 11, 2011

इंतज़ार...(कहानी लिखने की एक अदनी सी कोशिश)


उस दिन सब कुछ याद आ रहा था मुझे,,,दोस्तों की बातें...वो कहते थे कि इतनी सिगरेट मत पियो,,,शराब पीना बंद कर दो,,,कैंसर हो जाएगा,,,पापा को खूब सारी खुशियाँ देनी थीं,,,मां को तीर्थस्थानों की सैर पर भी ले जाना था,,,और छोटे को...उसको एप्पल का लैपटॉप देना था पर अब क्या...अब तो सब कुछ हाथ से निकल गया न...मैंने खुद को खत्म कर ही लिया...अचानक गाल पर एक बूंद गिरी...झट से आंख खुली तो देखा मां मेरे सिरहाने बैठी मुझे देख देखकर बस रोए जा रही थीं... बगल में पापा एक कुर्सी पर मायूस से बैठे मुझे एक टक देख रहे थे... पांच साल पहले अपना शहर छोड़कर दिल्ली आया था मैं...घर से निकल रहा था तो बस इतना पता था कि उस शहर में जिंदगी नहीं है अब...ट्रेन में बैठने के पहले की सिर्फ दो चीजें याद थीं, एक मां का रोना और बार बार पूछना कि अचानक दिल्ली क्यों बस रहे हो नीरज....एक बार ठंडे दिमाग से सोच लो बेटा और दूसरा, अदिति को वो मैसेज जिसमें उसने मुझे अपनी सगाई के बारे में बताया था। और कहा था कि मुझे प्यार करते हो तो प्लीज कुछ पूछना मत, सिर्फ मुझे भूल जाओ नीरज। अदिति मेरी हमसफर थी... हर लव स्टोरी थी की तरह हमारी भी एक प्यारी सी कहानी थी, कॉलेज में मुझे उससे लव एट फर्स्ट साइट हुआ था। पूरे पांच साल हमने साथ गुजारे थे और जिंदगी भर साथ रहने का फैसला भी कर चुके थे...लेकिन एक ही दिक्कत थी, हमारी कास्ट एक नहीं थी। मैं पंडित था और वो वैश्य। उसने करीब एक साल पहले अपने घर में बात की थी मेरे बारे में...बहुत बवाल हुआ था...मैं तो डर रहा था कि कहीं...कहीं उसे कुछ....मार न दें उसके पापा। कहती थी, बहुत कट्टर हैं उसके घर वाले। अगले दिन उसका फोन आया तो मेरी जान में जान आई, वो बहुत रो रही थी लेकिन कह रही थी घर वाले मान जाएंगे, थोड़ा वक्त लगेगा। मैंने कहा था परेशान मत हो, मैं बात कर सकता हूं अगर तुम कहो तो। उसने कहा, नहीं वो तुम्हें जान से मार देंगे अगर तुमने उनसे बात की। मैंने उस वक्त कुछ नहीं कहा....मैंने कहा जितनी जल्दी हो सके तुम वापस आ जाओ। फिर वो जब शहर लौटी तो लिपटकर खूब रोई थी, कहने लगी कि मुझे डर है कि तुम खो न जाओ। मैंने सोचा था इमोशनल हो रही है, बस। और उस दिन न जाने उसे क्या हुआ था....जो उसने वो मैसेज कर दिया। लेकिन अब सब याद आ रहा था, वो बहुत इमोशनल थी न....पापा-मम्मी के आंसुओं से पिघल गई होगी। उनको बहुत चाहती थी अदिति...मुझे भी....लेकिन किसी एक को चुनना था उसे। बस उसी दिन से सिगरेट पीनी शुरू कर दी थी हिंदी फिल्मों के सैड एक्टर्स की तरह....मैं भी अक्सर प्यासा जैसी फिल्में देखकर खुद को गुरू दत्त समझ बैठता और कई दिनों तक एक ही गाना गाता रहता...जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला...और मोबाइल पर इसे रिपीट पर लगाकर सो जाता था....


घर में सभी जानते थे अदिति को...वो अक्सर घर आती थी...मां भी उसे पसंद करने लगी थीं...पापा भी...हालांकि उनकी स्वीकृति हमेशा मौन ही रहती थी लेकिन अब सबको ये पता चल चुका था कि अदिति की सगाई होने वाली है। मेरे मोबाइल का मैसेज छोटे ने पढ़कर मां को बता दिया था इसलिए सबको अंदाजा था कि मेरा ये हाल क्यों है...मैं ऑफिस जाता और आकर अपने कमरे में बंद हो जाता...दिन भर गाने सुनता रहता और कम्प्यूटर पर अपनी और अदिति की फोटो देखता रहता। रोता और बाहर जाकर सिगरेट पीकर चला आता। कभी कभी उसके एक दो गिफ्ट तोड़ देता तो अगली सुबह मां चुपचाप उसे उठाकर एक बैग में डाल देंती क्योंकि उन्हें पता था कि मैं कोई गिफ्ट फेंकता नहीं। उन दिनों दोस्तों यारों से भी मिलना जुलना बंद कर दिया था...उन्हीं दिनों मन में ख्याल आया कि क्या हुआ अगर साथ नहीं जी सके...उसकी यादों के साथ तो जी सकते हैं और लगा इस षहर में रहकर यह मुमकिन नहीं होगा. जॉब चेंज करने का मन बनाया, दिल्ली में दोस्तों से बात की और चला आया दिल्ली। ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लग रही थी...बाहर उतरकर देखा तो राजीव इंतजार कर रहा था...पहली बार दिल्ली आया था न तो रिसीव करने आया था...राजीव दिल्ली की एक इंग्लिष मैग्जीन में एसिस्टेंट एडिटर था।


मैंने प्लेटफॉर्म पर ही सिगरेट निकाली और लाइटर से जला ली तो वो भौंचक्का रह गया...कहने लगा तुझे क्या हो गया है? ये सब क्या है? तू....अबे तू कबसे पीने लगा? तुझे तो कॉलेज के दिनों में बड़ी नफरत थी न इन सब हरकतों से...मैंने उसके सवाल को धुंए के छल्लों के साथ उड़ा दिया...उसने भी दोबारा नहीं पूछा...कंधे पर हाथ रखकर बोला...ला, अपना सामान मुझे दे दे...तू थका होगा....और झट से एक बैग ले लिया। अजमेरी गेट की तरफ हम निकले और मेट्रो पकड़कर मयूर विहार में अपने रूम चले गए। वहां पहुंचकर मेरे पास कोई खास काम नहीं था...जब तक मैंने नई जॉब नहीं शुरू की तब

तक रोज सुबह राजीव चाय बनाकर ऑफिस चला जाता और मैं उठते ही चाय के साथ सिगरेट पीता और लैपटॉप में अदिति की यादों में खो जाता। शाम होते होते नहाता और फिर चाय पीकर आता। घर से रोज फोन आते सो एक दिन फोन ऑफ करके रख दिया और घर वालों से कह दिया कि मेरा फोन चोरी हो गया, जब बात करनी होगी तो मैं राजीव के फोन से ही बात कर लूंगा। नई जॉब लग गई। सेलरी अच्छी थी और काम भी कुछ खास नहीं था। मैंने शराब और सिगरेट दोनों ज्यादा कर दी, उन दिनों एक और दोस्त सचिन ने एक न्यूजपेपर ज्वाइन किया और साथ में रहने लगा...पहली बार जब उसने मुझे पीते हुए देखा तो उसके भी फाकते उड़ गए लेकिन उसे भी धीरे धीरे आदत पड़ गई। जैसे जैसे वक्त बीतता गया, मेरा जख्म गहरा होता गया, मैं जितना अदिति को भूलने की कोशिश करता, उतना ही वो याद आती, सोते जागते हर वक्त सिर्फ वो ही थी। इस बीच छोटे का एडमिशन एक इंजीनियरिंग कॉलेज में हो गया और उसकी पढ़ाई मेरी जिम्मेदारी बन गई। मैं घर जाता ही नहीं, छोटे को पैसे भेजकर मां और पिता जी के लिए अक्सर कुछ न कुछ भिजवा देता। एक दिन राजीव के फोन पर मां की कॉल आई....राजीव ने घर आकर मेरी उनसे बात कराई तो उन्होंने कहा कि अदिति का फोन आया था...वो बहुत परेषान थी और रोए जा रही थी। मैं परेशान हो गया और झट से अपना फोन निकालकर उसे ऑन किया और उसे कॉल करने लगा...उधर से आवाज आई....द सब्सक्राइबर यू आर ट्राइंग टू कॉल इज करंटली स्विच्ड ऑफ। मैंने अपना फोन चार्जिंग पर लगा दिया और इंतजार करने लगा कि शायद उसकी कॉल एक बार आ जाए। उसके सारे दोस्तों को कॉल की लेकिन किसी के पास उसकी कोई खबर नहीं थी। कॉल का वेट करते करते मैं सो गया और अचानक फोन बजा...मैं झट से उठा तो देखा सुबह के सात बज रहे थे...मम्मी की कॉल थी....मैंने झट से फोन उठाया और जैसे ही हैलो कहा

उधर से मम्मी जोर जोर से रोने लगीं, मैं बहुत परेशान हो गया, मुझे भी रोना आ गया और मैं बस इतना पूछ पा रहा था कि मां...मां....क्या....क्या हुआ मां? इतने में पापा ने फोन लिया और धीरे से बोले-.........बेटा नीरज....तुम बहुत मजबूत हो, प्लीज अपने आप को संभालना और कुछ गलत मत करना... अदिति ने शादी नहीं की थी....उसने कल सुसाइड कर लिया। अखबार में खबर छपी है। मेरे हाथ से फोन छूट गया....मैं सन्न रह गया था...


देखते देखते तीन बरस बीत गए। स्मोकिंग चेन स्मोकिंग में बदल चुकी थी और ड्रिंकिंग भी ज्यादा फ्रीक्वेंट हो गई थी। अब तो क्या दिन क्या रात, मौका मिलते ही मैं अदिति को भुलाने के लिए शराब और सिगरेट का सहारा ले लेता था। वक्त गुजरता जा रहा था और साथ ही मेरी तबियत भी खराब होने लगी थी, लेकिन मैंने किसी से बताया नहीं, एक दो बार दोस्तों को लगा भी तो मैंने बहाना बना दिया कि बुखार है और सिर में दर्द की वजह से आंखों के नीचे कालापन रहने लगा है। उन्हें शक तो हुआ लेकिन उन्होंने मुझपर कभी जोर नहीं डाला। तभी एक दिन खबर आई कि छोटे का कैम्पस प्लेसमेंट हो गया है। वो बहुत खुश था। मैं कुछ पल के लिए बीते चार सालों में एक बार खुश हुआ था। सुकून सिर्फ इस बात का था कि अब मां और बाबू जी को छोटे का साथ भी मिल जाएगा। मैंने ऑफिस से चार सालों में एक भी एक्स्ट्रा ऑफ नहीं लिया था। एक दिन अचानक मन हुआ कि मां और बाबू जी को तीर्थयात्रा पर ले चलूं। ऑफिस से एक महीने की छुट्टी ली और प्लान बनाया कि कल सुबह उठते ही रिजर्वेशन करवाकर शहर जाउंगा और अगले दिन फ्लाइट से सबको लेकर कन्याकुमारी और फिर एक एक करके जम्मू तक जाउंगा। रात ख़ुशी थी इसलिए और पी ली...अगली सुबह होश आया तो खुद को हॉस्पिटल के बेड पर पाया...राजीव और सचिन बगल में बैठे थे। मेरे मुंह पर ऑक्सीजन मास्क लगा था और हाथ में ड्रिप लगी हुई थी। मैंने दूसरे हाथ से सचिन के पैर पर हाथ रखा और आंखों से उससे पूछना चाहा कि डॉक्टर ने क्या कहा? उसे जाने क्या हुआ और वो सीने से लगकर रोने लगा....मैंने राजीव की तरफ देखा तो उसकी आंखों में भी आंसू छलक आए और उसने बडी हिम्मत बांधकर कहा....कैं....कैं....कैंसर। मुझे झटका लगा लेकिन अगले ही पल मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई। लगा जैसे जीकर न सही, मरकर ही अदिति के साथ रह लूंगा... छोटे को बताया नहीं गया था कि मैं आईसीयू में भर्ती हूं...उसके आखिरी सेमेस्टर के एग्जाम जो चल रहे थे...मैंने ही मना करवाया था... मां और बाबूजी के लिए ही एयर टिकट भेज दिए थे दोस्तों ने सो किसी और को उन्होंने शायद बताया भी नहीं था...जरूरत भी नहीं थी। मैंने तो दोस्तों से बाबूजी और मां को भी खबर करने को मना किया था पर वो नहीं माने थे। सुबह की पहली फ्लाइट से आ गए थे। मां बार बार कह रही थी कि बेटा तुम ठीक हो जाओगे....कुछ नहीं होगा तुम्हें....आज फिर चार महीने बीत चुके हैं... अदिति से मिलने की बेसब्री बढ़ती जा रही है...डॉक्टर कहते हैं कि मेरे पास सिर्फ एक महीना और है...मां-पापा तीर्थयात्रा कर आए लेकिन छोटे के साथ और उन्हें लगता है कि नीरज ठीक हो रहा है, जल्दी ही वो पूरी तरह ठीक हो जाएगा...


6 comments:

pratibha said...

sundar!

SanjayS. said...

Bahut Sundar and seriously very sensitive.....

नीरज बसलियाल said...

बढ़िया कहानी है , बस मुख्य चरित्र का नाम बदल दो :)

Panchi said...

nice one................:)

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 28/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मार्मिक प्रस्तुति ... प्यार की संवेदनशीलता में माता पिता के प्रति कर्तव्य कहीं पीछे छुट गया .

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