Friday, April 5, 2013

जीवन : बातों की गठरी

फोटो गूगल से साभार 


जीवन बढ़ा था मेरी ओर 
मैंने देखा था उसे आते हुए 
या वह भी था एक ख्वाब का अबूझ सा सिरा 
नहीं हो सकी हमारी मुलाक़ात 
शायद भांप लिए थे उसने मेरे जज़्बात 
टटोल ली थी वो नब्ज़ 
जो गले की अँधेरी कोठरी से निकलने को बेताब थी 
या नाप ली थी 
मेरे खोखले सुनसान मन की गहराई 
और उसमें पड़े 
वो सवालों के ढेर देख लिए थे 
लेकिन यकीं है 
जीवन महज मृग मरीचिका भर नहीं 
कुछ और जिन्दा लाशों की 
आवाज़ सुनी होगी शायद 
और मुड़  गए होगे तुम उनकी ओर 
उनके सूखे दरख़्त से 
बदन में जान रोपने को 
मुझसे भी मिलोगे किसी दिन 
किसी ठहरी सी घडी के 
एक एकांत मोड़ पर
बातों की गठरी खुलने लगी है  
कुछ तुम ले जाना, 
कुछ मैं फिर से समेट लूँगा...  

Wednesday, March 6, 2013

देर आयद दुरुस्त आयद- फेसबुक तुस्सी ग्रेट हो!

फोटो गूगल से साभार


मन शांत और विचार सधे से लग रहे हैं। इसलिए, मेरा नया साल आज है। हर साल की तरह इस साल की पहली रपट पेश कर रहा हूँ। 

खास बात ये है कि हर बार की तरह इस बार भी ये सोचने की जरुरत नहीं पड़ी कि  विषय क्या हो। विषय मेरे साथ-सामने है। गूगल क्रोम ब्राउजर के दूसरे टैब में। फेसबुक। 

कई लोगों के लिए यह बीमारी, लत या विकार होगा, पर मेरे लिए ये दुनिया का प्रतिबिम्ब है। दुनिया, जीवन और समाज के हर पहलू का एक समाजशास्त्र है और ये फेसबुक उसका शॉर्ट हैंड-शॉर्ट कट। पिछले करीब दो साल से इसका खूब दोहन किया है। लेकिन, कहीं कोई जिक्र नहीं। सोच कर ही ''खर्राब'' लग रहा है। ये तो सरासर नाइंसाफी है। खैर, कहते हैं न… देर आयद दुरुस्त आयद।   

दरअसल, मैंने हमेशा से माना है कि मेरे अधकचरे बौद्धिक-सामाजिक विकास में फेसबुक का अहम् योगदान रहा है। कई बेहतरीन, ख़राब, सहिष्णु, कट्टर, मूर्ख और विद्वान लोगों से मुलाक़ात हुई है यहाँ। समय भी ख़राब हुआ है। लेकिन, देश-दीन-दुनिया के बारे में काफी समझ भी बढ़ी है। अगर कुछ खास उपलब्धियों की बात करूँ तो राहुल पंडिता, सुरभि गोयल, नीलेश मिश्रा, रवीश कुमार, उदय प्रकाश, विनीत, मिहिर, रंगनाथ, स्नेह और संजय श्रीवास्तव जैसे कई मिली-जुली प्रतिभाओं वाले लोगों से बात-मुलाक़ात हुई। कुछ के साथ प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से काम करने का मौका भी मिला। इनके जो चेहरे पहले देखे, बाद में उसके रंग भी देखने को मिले। 

चेहरों के इतर, दिल्ली की तंग गलियों में रहते हुए अविनाश के अच्छे-बुरे मोहल्ले में भी आना जाना लगा रहा। शिव कुमार बटालवी और सुशीला रमन के संगीत से भी फेसबुक ने ही मिलाया। शोभा गुर्तु और सोना महापात्र से भी। कई किताबें सिर्फ इसकी वजह से ही पढने का मन बना। ओपन और तहलका को नियमित रूप से पढने का सिलसिला या शौक भी इसकी ही मेहरबानी है। कई स्तम्भ ऐसे हैं, जिनका बेसब्री से इंतज़ार रहता है। 

फेसबुक का सबसे बड़ा फायदा क्या रहा? ये कहना तो थोडा मुश्किल है, लेकिन सच कहूँ तो एक नौकरी मिली वो भी ऐसे वक़्त में जब भयंकर गर्मी थी और दूर-दूर तक महज मृग मरीचिका नज़र आ रही थी। जी हाँ, नौकरी वाकई बड़ी चीज़ है। ये न हो, तो कोई ज्ञान पसंद नहीं आता। न ही कोई संगीत। इसलिए, शुक्रिया फेसबुक। 

वैचारिक तौर पर इसने हमेशा मुझे चुनौती दी है। मैं खुद को खुशनसीब समझता हूँ कि ऐसा हुआ। हालाँकि, मेरे एक दोस्त-शुभचिंतक अक्सर कहते हैं कि तुम दोगली बात करते हो। मैं कहता हूँ, आखिर क्यूँ न करूँ? अगर मुझे नयी सोच मिलती है और वो मेरी सोच से बेहतर है तो मैं क्यूँ न उसका समर्थन करूँ। और, सच कहूँ तो इस किताब में विचारों, विश्लेषणों और नजरियों का जखीरा है। आप जितना पढ़ते हैं, उतना ही आपकी सोच, आपके विचार परिष्कृत होते हैं। 

जाहिर तौर पर यहाँ सब अच्छा नहीं है, घटिया बातें भी मजे से होती हैं। घटिया सोच और मकसद के साथ। वो सब भी पढ़ा, देखा और सुना है। ये जरुरी था, है और रहेगा। फरक करने की क्षमता शायद इसी से विकसित होती है। और संतुलन भी तो जरूरी  है। परफेक्शन न संभव है न ही जरूरी। 

क्यूंकि इसके साथ मीडिया शब्द जुड़ चुका है तो इसका चरित्र भी बदला है। सनसनी है और संवेदना भी और इसकी अतिशयोक्ति भी है। लेकिन, जानकारियां भी बहुत हैं। कुछ नया मिल ही जाता है हर कुछ दिन पर। आज ही ऐसा कुछ हुआ जिसने मुझे झकझोर दिया। तहलका में ''संघ का मुस्लिम प्रेम'' शीर्षक से प्रकाशित एक लेख ने बता दिया कि मुझे संघ के बारे में बहुत कुछ नहीं पता, जबकि मैं संघ से लम्बे समय से जुड़ा रहा हूँ। खैर, पढने के बाद कई सवाल मन में हैं। 

जल्द ही पूछता हूँ, अगली रपट में... 

Wednesday, December 26, 2012

बलात्कार और चीत्कार : एक युवा आन्दोलन





पिछले करीब डेढ़ साल में मैंने दो बड़े विद्रोह बहुत करीब से देखे। पहला अन्ना का और दूसरा बिना चेहरे के युवाओं का। यह चढ़ रहा है। बलात्कार के विरोध में। पहला भ्रष्टाचार को लेकर था और दूसरा खुद में स्त्री विमर्श  छिपाए हुए है। दिलचस्प ये है कि दोनों ही विद्रोह सिर्फ व्यवस्था पर चोट नहीं हैंदोनों ने समाज की जड़ों को हिलाने का दम भरा है। भ्रष्टाचार में हम सब शामिल  रहे हैं। औरबलात्कार भी कृत्य से ज्यादा  सोच और प्रथा है। जो हमारे  देश की रग रग मे बसी है। हमारी रगों में बहते खून के साथ दौड़ती है ये सोच। स्त्री दमन की। कमजोर के शोषण की। 

हमें यह समझना होगा कि बलात्कार सिर्फ शरीर का नहीं होतावो जीवन और जीने के अधिकार का होता है। ये होता आया है। इस देश की विडम्बना यही रही है। जिसके पास बल हैवो उसका दोहन करता रहा है। जो कमजोर हैवो लुटता रहा है। इस सबके बीच माध्यम वर्ग रोटी-कपडा और मकान से आगे सोच ही नहीं पाया। लेकिनइन दोनों ही विद्रोहों को देखकर लगता है कि माध्यम वर्ग जाग गया है। कुछ देर के लिए ही सही। और शायद कभी न सोने के लिए। जाग गया है। और ये देश के निजामों के लिए खतरनाक संकेत है। 

जब 16 दिसंबर  की रात देश की राजधानी में 23 साल की एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार होता हैतो आश्चर्यजनक रूप से माध्यम वर्ग (खासकर युवाओं) की नींद टूट जाती है। शुरुआत जेएनयु से होती है। प्रतिशोध की आग में लिपटे युवा सडकों पर आ निकलते हैं। पर वो किसी को हानि नहीं पहुंचाते। न राजकीय संपत्ति को और न ही पुलिस को। वे शांति से अपना विरोध व्यक्त करते हैं। प्रदर्शन करते हैं। नारे लगाते हैं। इन्हें देखकर बाकियों के भीतर दुबकी आग भी दहकती है। वो भी रातभर जागकर झंडे पोस्टर तैयार करते हैं। इसके बाद प्रदर्शन की बाढ़ आती है। इंडिया गेट पर बिना चेहरे के प्रदर्शन होते हैं। सिर्फ एक आवाज। सिर्फ एक नारेसिर्फ एक मांग के साथ। बलात्कारियों को फांसी। तीन दिन तक ये आन्दोलन  चलता  है। बढ़ता है। और रायसीना तक पहुँचता है। देश के दिल पर शायद ये पहला युवा आदोलन है। इंडिया गेट से लेकर नॉर्थ ब्लॉक तक इस मांग की चीख पहुँचती है। वहां प्रदर्शन उग्र रूप लेता हैऔर उसका फल भुगतती है पुलिस। हाँ पुलिस। क्यूंकि मैं ये नहीं मान सकता कि जो युवा शांति से प्रदर्शन कर रहे थेवो अचानक तोड़ फोड़ करने लगे। जाहिर तौर पर उनमें कुछ असामाजिक तत्त्व शामिल थे। (जो राह चलती लड़कियों को छेड़ते हैं। जो मा-बहन को गाली बना चुके हैं। जो बात-बेबात पे माँ और बहन का शाब्दिक बलात्कार करते हैं।) जिन युवतियों को चोट आईवो गलत था लेकिन शुरुआत पुलिस ने नहीं की। पुलिस ज्यादा ही बर्बर हो जाती है। और उनमें भी कई पुरुषवादी मानसिकता के  शिकार होते हैं।  वे अपनी बेटियों पर डंडे भांजने में कोई कोताही नहीं करते। वे घर में भी नहीं करते। दूसरी तरफनिज़ाम भी आवाज़ सुनना नहीं चाहतेदेखना चाहते हैं। एक ऐसा चेहराजिससे वो समझौता कर सकते। फिर ये निज़ाम रोटी फेंकते है। जिस पर लिखा होता है, ''एक चेहरा चाहिए''। हमारे देश की भूखी मीडिया टूट पड़ती है उस रोटी पर।    

फिर पुरुषवादी सोच से ग्रस्त मीडिया खेल रचता है। आन्दोलन को भटकाने की पूरी कोशिश शुरू हो जाती है। इससे उम्मीद भी क्या होगी। जिस मीडिया की  स्क्रीन पर महिला की जर्जर तस्वीर चस्पा हो। जिसकी सोच में महिला लज्जा का पात्र होजिसकी नज़र में महिला दयनीय होवो क्या  करेगा।  इस आन्दोलन की चीख उनके कानों को चीरती रहीलेकिन उन्हें कोई चेहरा चाहिए था। जो कैमरे पर साक्षात दिखे। जो उनसे बात करे। और उन्होंने कर दिखाया। रविवार को इंडिया गेट और विजय चौक पर चेहरे पहुचे। राजनीतिक रंग में लिपटे। लालहरे और भगवा में सने चेहरे। वो चेहरे भी नहीं दिखे लेकिन उनके वहां होने का हश्र दिखा। राजकीय संपत्ति जलीआन्दोलन की आवाज दब गई और उग्र चेहरा दिखने लगा। हर तरफ आग और तोड़फोड़। निश्चित ही ये वो युवा नहीं थाजिसने विद्रोह शुरू किया था। फिर क्यासब पर लाठियां बरसीं। क्या महिलाक्या युवती और क्या पत्रकारसब  चोटिल हुए। और मुद्दा तितर बितर हो जाता है। कुछ पल के लिए। या फिर शायद अनिश्चितकाल के लिए। इस विद्रोह में एक पुलिस वाले की मौत भी हो गई है। 

युवाओं को इस विद्रोह को जिन्दा रखना होगा। मध्यम मार्ग से अपनी आवाज़ निजामों तक  पहुंचानी होगी। बदलाव सुनिश्चित है। लेकिनहिंसा से कुछ हासिल नहीं होगा। जहाँ तक सफदरजंग में पड़ी उस लड़की का सवाल हैतो उसकी ज़िन्दगी कोई नहीं  लौटा सकता। न आपन कोई कानून और न ही कोई सरकार। इस देश में हर मिनट करीब 22 बलात्कार होते हैं। उनकी सुध कोई नहीं ले पाता। कानून सख्त होना जितना जरुरी हैफांसी की सजा जितनी जरुरी है, उतनी  ही जरुरी है अपनी सोच में बदलाव। और ये बदलाव कोई कानूनकोई प्रदर्शन नहीं ला सकता। ये आपके घर से होगा। 

Thursday, November 1, 2012

क्यूं?



चांद ये सुर्ख सा क्यूं हैं
क्यूं बेसुब जर्द है सूरज
कदम आहिस्ते रखता हूं
निशां गुमनाम सब क्यूं हैं

क्यूं धरती बह रही है यूं
समंदर थम गए क्यूं हैं
आसमां देखता मैं हूं
धुआं बेरंग सा क्यूं है

मकां क्यूं ढह गए सारे
क्यूं दुकानें बिक रही हैं ये
नजरें बंद करता हूं
ख्वाब ये जागते क्यूं हैं

सुबहें नींद में क्यूं हैं
क्यूं ये शब जागती हैं
खोजता रात भर मैं हूं
शमा के राज क्यूं गुम हैं

क्यूं ये तनहाई बोलती है
शोर खामोश से क्यूं हैं
फिरता मैं अकेला हूं
हमसफर भीड़ क्यूं गुम है

बारिश सूखी हुई क्यूं है
क्यूं हवाएं भीगी हैं
रोना चाहते है वो
आखें बंजर मेरी क्यूं हैं

पंछी पिंजरों क्यूं हैं सब
क्यूं चुपचाप हैं डालें
मंजिल को चले हैं वो
दोराहे मेरे क्यूं गुम हैं

ख्वाहिश लापता क्यूं है
क्यूं जुम्बिश में खलिश सी है
रातें जागते वो हैं
नींदें मेरी क्यूं गुम हैं ।।

-------निखिल श्रीवास्तव 


Friday, September 28, 2012

कि कोई दूसरा जहाँ भी होगा...

फोटो गूगल से साभार 

न मिली 
नींद भर जमीं, धूप भर 
आसमां न मिला 
खामोश रहे वो शायद  
कि कोई दूसरा जहाँ भी होगा....

न किये 
तकादे खुदा से, किस्मत से 
हिसाब न माँगा 
गम पी गए वो शायद
कि कोई दूसरा जहाँ भी होगा... 

न मांगी
सुबह खुशियों की, रातों से 
आस न मांगी 
पड़े रहे किनारों पे शायद 
कि कोई दूसरा जहाँ भी होगा

न देखे 
ख्वाब सोने के, तश्तरी 
चांदी की न चाही
पिघलते रहे वो भट्टों में शायद
कि कोई दूसरा जहाँ भी होगा 

जलते रहे 
ज़िन्दगी भर, तपिश से 
दूर न भागे, मौत भी 
आ गई लेकिन, खुदा से राख न मांगी 
शायद उन मजदूरों के लिए 
कोई दूसरा जहाँ भी होगा ....

Saturday, September 22, 2012

कुछ सवाल

गूगल से साभार 

क्यूँ हैं
ये मायूस सी गली 
गुमसुम सा चाँद
हांफती सड़क पे रेंगते निशान...

क्यूँ है
ये तड़पती सी हवा 
अनजान सी  सिरहन 
कोसते सफ़र पे बेजुबान धडकन...

क्यूँ हैं...
ये चीखते से जश्न  
दरकते से तख़्त 
सूखती नसों पे सिरफिरा वक़्त... 

क्यूँ हैं, 
ये उजड़ता सा लम्हा
खटकता सा अश्क 
हमारी चाहतों पे लिपटता रश्क... 

क्यूँ हैं,
ये उदास सा मौसम 
बदहवास सा दर्द 
चटखती ज़िन्दगी पे ये आहें सर्द....

Friday, March 30, 2012

कौन हैं वो

फोटो गूगल से साभार 
कौन हैं वो 
जो कहते हैं 
खुद को "झूठे"  
सच का अनुगामी 

कौन हैं वो 
जो कैद हैं 
कई "धाराओं" में
बनके अनुयायी

कौन हैं वो 
जो देखते हैं 
हर एक "इज्म" में 
अपना प्रतिबिम्ब 

कौन हैं वो
जो ठोकते हैं 
हर "काल" में 
अपनी बेसुरी ताल

कौन हैं वो 
जो करते हैं
हर "कारिता" में 
अद्भुत चाटुकारिता 

कौन हैं वो 
जो करते हैं 
हर रोज़ क़त्ल 
किसी ख्वाब का 

और कौन हैं वो 
जो समर्थ हैं
पर मौन हैं, बंद 
डर के दरवाजों में 

कौन हैं वो 
जो लिखते हैं 
दर्द, प्यास, भूख से 
आच्छादित आकाश में... 

---निखिल श्रीवास्तव--- 
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