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Monday, June 23, 2014

तनु शर्मा, तुमने हम गूंगों को जुबान तो दी मगर...

सच कहूं तो तनु शर्मा ने सही किया या गलत, ये तो नहीं कह सकता पर वो ऐसा न करती तो शायद ये बहस हमारे मन की अंधेरी ओर काफी हद तक मैली कोठरी में ही घुट घुट कर मर जाती।

बहस कि क्यों मजबूर हुई वो आत्महत्या के लिए? क्या हो रहा है पत्रकारिता के बोर्ड टंगे बंद दरवाजों के पीछे?

पर, बहस सिर्फ टीवी के न्यूज रूम तक ही क्यों टिकी रहे? यह माध्यम हर खबर को सनसनीखेज बनाता है, इसलिए? प्रिंट भी तो हर खबर के साथ बड़े-बड़े लोगो लगा देता है..फलां इनीशिएटिव। फलां पहल। सबसे पहले। ग्राउंड पर। आसमान में। पाताल में। एक्सक्लूसिव। फिर इलेक्ट्रॉनिक उन्हीं ज्यादातर खबरों के साथ सनसनीखेज अंदाज में खेलते हैं।






कुल मिलाकर, सब एक जैसे हैं। इम्पैक्ट अलग-अलग है। बीते दिनों हिंदुस्तान के एक युवा पत्रकार का आत्महत्या करना भी खबर था? कितनों को पता है कि कौन मरा? क्यों मरा? किसका दोष था? ज्यादातर बुद्घिजीवी कहते हैं कि आत्महत्या करना कमजोरी की निशानी है। मैं भी कहता हूं, लेकिन क्या इतना कह देने भर से हमारा काम खत्म हो जाता है।

राजनीतिक खबर का तो पिचहत्तर एंगल से विश्लेषण होता है। ऐसा विश्लेषण किसी श्रमजीवी पत्रकार की मौत पर या अटेम्‍प्ट पर क्यों नहीं होता? क्योंकि वो तो घर की बात है न। उसे अंदर ही रहना चाहिए। है न। और जो दूसरे घरों में मौत का लाइव अपडेट देने के लिए ओवी वैन घुसेड़ देते हैं?वो?

मोटा टीए डीए लेकर प्रिंट के साथी जो बदायूं के चक्कर एक अदद एक्सक्लूसिव सॉफ्ट स्टोरी की तलाश में काटते रहते हैं वो?

सवाल प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक का नहीं है। सवाल है लोगों की सोच का। शर्म की बात है कि हमारे आस पास ज्यादातर लोग इस काबिलियत के नहीं कि वे संपादक या किसी बड़े औहदे पर पहुंच सकें। जो पहुंच रहा है वो अपनी पोजीशन का हद तक गलत इस्तेमाल कर रहा है।

जो बोलते हैं, उन्हें तमाम नाम दे दिए जाते हैं। उन पर तमाम तंज कसे जाते हैं। भरी मीटिंगों में उनका मजाक बनाया जाता है। उनके परिश्रम को उनके विरोध के नीचे कुचल दिया जाता है। विरोध की आवाज से इन्हें कतई परहेज है।

यह कहते हुए शर्म आती है कि आज हमारी बिरादरी में पत्रकार कम और मैनेजर, अधिकारी, बॉस और बिग बॉस पत्रकार का चोंगा पहनकर मनमानी कर रहे हैं। परिवार और एक अदद नौकरी की जरूरत में सही लोगों की जुबान पर ताले लग चुके हैं। नाकाबिलों की जुबान तेलीय हो चुकी है। रंगों में खून की जगह भी तेल बह रहा है शायद।

मीडिया की नौकरी मानो मजदूरी हो गई है। सुपरवाइजर का मन हुआ, तो चार गाली देकर भगा दिया। वेतन मनमुताबिक बढ़ा घटा दिया। काम खराब किया तो नौकरी से निकालना तय है। अच्छा काम किया तो साल की मेहनत का हिसाब आप मांग नहीं सकते। मांगा तो खैर नहीं। नौकरी से निकालने की धमकी।

कुछ मिलाकर ये जो आभामंडल है न, ये बेहद झूठा है। बेहश विशाक्त। ये दूर से बड़ा अच्छा लगता है। भीतर से उतना ही घिनौना। बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि ये बहस स्वांतःसुखाय के लिए चार दिन तक खूब होंगी। फिर तनु के इस कदम से हमारा जो दिमाग सुन्न पड़ा है और एक ही जगह अटका है, वो फिर अपनी परेशानियों में उलझ जाएगा।

काफी पहले मेरे एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे सलाह दी थी, अपने आत्म सम्मान से समझौता मत करना। बाद में कुछ घटनाक्रम ऐसे हुए जिन पर उनसे ही चर्चा की तो उन्होंने एक एचआर मैनेजर की तरह मुझसे कहा...मैं नहीं जानता कि आपका पर्सनल क्या है क्या नहीं।

ये भी मानसिक शोषण ही तो था?

मेरा आंकलन बहुतों को नागवार गुजरेगा, पर मैं वही लिखता-कहता आया हूं जो सही लगता है। चुप रहूं तो बात अलग। लाघ-लपेट मुझे न आती है न मैं सीख सकता हूं। इस बहस का मरना किसी सनसनीखेज खबर की तरह होगा।

भड़ास हिट्स गिन रहा होगा, कुछ अखबार जिन्होंने खबर छापी वे अपनी पीठ थपथपा रहे होंगे। ज्यादातर पत्रकार इस मसले को महज एक खबर की तरह ले रहे होंगे। बहुत मुमकिन कि उनको इस बात का अहसास भी नहीं होगा।

दरअसल, हम पत्रकारों के लिए हर दर्द, हर खुशी महज एक खबर की तरह होती है। हम मौत का जश्न मनाते हैं। आपदा सबसे अच्छी खबर होती है। विनाश उससे भी बड़ी। सफलता बड़ी खबर के पैमाने पर छोटी खबर है। और हम सब इन खबरों से खेलकर अपने लिए सब्जबाग बुन लेते हैं। कुलीश, गोयनका और कुछ तो पुलित्जर तक के ख्वाब देख लेते हैं।


बस दुआ करता हूं कि तनु कम से कम तुम जीकर जीत पाओ। हारोगी, तो तुम्हें भी बहुत खलेगा और मुझे भी। न जाने क्यों, सच का हारना बहुत दुख देता है।

Thursday, May 8, 2014

ज़िन्दगी ख़तम कहाँ होती है...

एक किसान था...
खेत बेचा था एक
सींचना था बड़ा सा दूसरा खेत
दाम कम मिले थे
पर उम्मीद थी एक दिन
वो फसल लहलहाएगी।

साल भर अपने बच्चों के साथ
खून से सींच डाला खेत
और साल भर बाद
देखकर अपने लहलहाते खेत
कहता था अपने बच्चों से
आएँगी बहार उनके जीवन में

पढ़ने जायेंगे खेत की
पगडंडियों से दूर
खुद की एक राह बनायेंगे

रात में ख्वाब घुल पाते
किसान के अरमानों को
एक अदद बार दोहरा पाते
सरसों के कोपल खुल पाते

कि एक जालिम रात गुज़री
उसकी ज़िन्दगी से होकर

सुबह तपिश बेपनाह थी
ज़िन्दगी का एक टुकड़ा
जल रहा था फसल के साथ

पीली ख़ुशी काली राख बन गयी
कुछ लोग बोले...ज़िन्दगी
का ये अंत तो नहीं।

कुछ आंसू गिरे
कुछ पोछ लिए गए
कुछ सूख के गालों पे
इक लकीर छोड़ गए

बच्चों ने बांध ली गठरी।
छोड़ दी किराये की वो कोठरी
भूल गए ख्वाब वो हसीन

बाप की राख नदी में
प्रवाहित कर वो भी किसी
सेठ की इमारत में ईंट
लगा रहे हैं...

ज़िन्दगी ख़तम कहाँ होती है...

माँ को अब भी उम्मीद है
किराये की छत से निकल
अपना घर बनाने की...

एक किसान तो था...

Thursday, January 28, 2010

छोटा मुंह बड़ी बात...(सोशल नेटवर्किंग का तमाशा पार्ट १)

बड़ा मुंह बड़ा काम का होता है। जरा सी आवाज़ आ जाये तो दुनिया पलक पांवड़े बिछा देती है। छोटे से मुंह की क्या बिसात। वैसे भी आजकल लोग उगे हुए सूरज को ही सलाम ठोकते हैं। बेशर्म...
ये कहना पता नहीं सही है या नहीं पर मन में आया है तो रुकुंगा नहीं। दरअसल एक सोशल नेटवर्किंग साईट पर एक उगे हुए सूरज ने कुछ फ़रमाया। इत्तेफाक से ठीक वही बात एक छोटे से तारे ने कुछ दिन पहले फरमाई थी। तारे की उस बात पर चुनिन्दा लोगों ने गौर फ़रमाया। खैर वो बात आई और गई। आज ठीक उसी बात पर जब सैकड़ों लोगों को ज्ञान बघारते देखा तो लगा की ये दुनिया नहीं सुधरने वाली। जो लोग चापलूसी को घटिया बताया करते हैं, वही जीभ लटकाए लपर चपर कर रहे थे। सच कहूँ तो लगातार मन में अजीब सी टीस हो रही है। ऐसा नहीं है कि उस छोटे से तारे के दोस्तों में वही ज्ञान बघारने वाले लोग नहीं थे। ज्यादातर नहीं तो कुछ तो वही थे। सवाल उठता है कि इसमें नया क्या है। तो मैं कोई प्रोडक्ट नहीं बेच रहा कि नया और पुराना देखूं। न ही ये कोई खबर है कि मैं डेस्क पर बैठकर इसका कोई नया एंगल बताऊँ। ऐसा होते हुए देखा है, पहले लगता था कि शायद लोग जानते न हों। फिर मन में आया कि हो सकता है उनकी शान के खिलाफ हो तारों को प्रोत्साहित करना। अब लगता है कि ये तो फितरत है लोगों की। ज्यादातर लोग कहीं ज्ञान देते हैं और पलट कर किसी न किसी की शान में कसीदे पढ़ने लगते हैं। हम खुद को ही नहीं सुधर पा रहे हैं, दुनिया क्या ख़ाक सुधारेंगे। लपर चपर और बातों की बाजीगरी करके जो खुद को युग प्रवर्तक समझते हैं तो वे शर्म करें। ऐसे नहीं आएगा बदलाव। शुरुआत 'मैं' से करनी पड़ेगी। पड़ेगी क्या करनी है। कौन क्या दे देगा, किसे क्या कहने से क्या फायदा होगा, सोचेंगे तो गर्त में जायेंगे। न यकीन हो तो देखिये फेसबुक, ट्वीटर और ऐसी ही साइट्स। ऐसा नहीं है की कुछ चुनिन्दा लोगों से अच्छे विचार किसी के नहीं है। फर्क उगे हुए और उग रहे का है। सूरज और तारे का है। बड़े और छोटे का है और युवा और अनुभव वाले का है। इस तरह की बातों पर अक्सर सुनता हूँ कि, अभी पैदा हुए हैं और चाहत है उड़ने की। ऐसी बातें जब तक होती रहेंगी, बदलाव नहीं होगा। ज्ञान बघारने से कुछ नहीं होगा। ब्लॉग्स पर कमेन्ट गिरते रहेंगे और साइबर कचरा जमा होता रहेगा। वहां भी टीआरपी देख कर खुश हो लेंगे लोग। कुछ लोगों को कोई अवार्ड मिल जाएगा. हो सकता है किसी पद्म अवार्ड भी मिल जाये. आज कल तो ये भी बतकही में बिक रहा है....और देश वहीँ का वहीँ रह जाएगा।
फिर भी मुझे उन तारों से उम्मीद है कि वो हताश नहीं होंगे, जगमगाते रहेंगे। एक दिन वो भी मुकाम पाएंगे और कुछ लोग उनके भी आस पास मंडराएंगे। लेकिन वो कभी वैसे नहीं बनेंगे।
आमीन।
(भूल चूक माफ़। मैं किसी कि भावनाओं को आहात नहीं करना चाहता। ये मेरी सोच और मेरा ही ऑब्जरवेशन है।)
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