कभी चिल्लाते थे, कभी गुनगुनाते थे
बचपन के आसमां पर, तारों से झिलमिलाते थे
गिरते थे, उठते थे और झट से मुस्कराते थे
भैया की आंखों से अपने आंसू छिपाते थे
पापा की पॉकेट से पैसे चुराते थे
मम्मी को चुपके से जाकर बताते थे
एक के सिक्के को हफ्तों चलाते थे
खो जाता था तो आंसू बहाते थे
छोटे को सताते थे, भूत से डराते थे
फ़िर, मम्मी की गोदी में ख़ुद सो जाते थे
हर रात परियों से मिलने हम जाते थे
उठकर सुबह बड़े से टब में नहाते थे
बारिश में जब हम कश्ती बनाते थे
मोहल्ले भर में नाव चलाते थे
आज याद आ गया वो बचपन
मास्टर जी के आने से पहले हम जब
रोज सोने का बहाना बनाते थे
आज फ़िर याद आ गया वो बचपन
जब हम जो थे वो ही नज़र आते थे ....
खो गया था दुनिया के झंझावातों में आइना देखता हूँ, पर खुद की तलाश है, मुसाफिर हूँ. ये अनकही खुली किताब है मेरी... हर पल नया सीखने की चाहत में मुसाफिर हूँ.. जिंदगी का रहस्य जानकर कुछ कहने की खातिर अनंत राह पर चला मैं मुसाफिर हूँ... राह में जो कुछ मिला उसे समेटता मुसाफिर हूँ... ग़मों को सहेजता, खुशियों को बांटता आवारा, अल्हड़, दीवाना, पागल सा मुसाफिर हूँ... खुशियों को अपना बनाने को बेक़रार इक मुसाफिर हूँ... उस ईश्वर, अल्लाह, मसीहा को खोजता मैं मुसाफिर हूँ...
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Thursday, October 8, 2009
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