Monday, January 16, 2012

गली-गली में "कोच" है...

फोटो महज सिम्बौलिक है. गूगल से साभार. 

जैसे बारिश के मौसम में जगह-जगह केंचुए निकल आते हैं वैसे ही क्रिकेट के मौसम में गली-कूचे से लेकर, रेल, बस और मेट्रो तक में "क्रिकेट के कोच" नजर आने लगते हैं. इन कोच की फेहरिस्त में वरीयता, पैमाना और अनुभव जैसा कोई मानक नहीं लागू होता. इस "क्रिकेटिंग" मौसम में बच्चे से लेकर बूढ़े तक, कोई भी कोच का भेष धारण कर सकता है. ऐसा लगता है कि भारत के किसी भी बच्चे को ए,बी,सी,डी...का ज्ञान हो न हो, लेकिन मानो वह अभिमन्यु की तर्ज पर क्रिकेट तो मां की कोख से ही सीख कर आता है. और शायद यही वजह है कि क्रिकेट के बारे में टिप्पणी करना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है. ऐसे में, जब भारत बुरी तरह पिट रहा हो, वो भी ऑस्ट्रेलिया जैसी किसी धुर विरोधी टीम से और पर्थ जैसी पिच पर तो आलोचना बेहद अहम हो जाती है. लोग खाना-पीना भूल सकते हैं, लेकिन मैच का आलोचनात्मक विश्लेषण नहीं. बच्चा-बच्चा सचिन, द्रविड़ और सहवाग के शॉट पर  अनोखा ज्ञान दे देता है. जिन्हें सही से फल्ली घुमाना तक नहीं आता, उन्हें भी चौराहा मेनटेन करने का बहाना मिल जाता है और वे भी अपने-अपने नुक्कड़ पर पनवाड़ी की दुकान पर क्रिकेट एक्सपर्ट नजर आते हैं. 

गेंदा-फल्ली के इस मौसम में घर का माहौल भी कुछ अलग ही होता है. देश-दुनिया में क्या हो रहा है, लोगों को इससे सरोकार नहीं होता, हर कोई गेंदा और फल्ली के इस विचित्र खेल का विश्लेषण करता दिखता है. किस बॉल को फाइन लेग पर खेलना है और किसे स्क्वॉयर कट करना है, किस बॉल को मिड ऑन पर खेलना है और किसे डिफेंस करना है, यह चर्चा गली-गली में आम हो जाती है. खास बात यह है कि हर चर्चा में मानो कई कोच अपनी राय देते हैं और चर्चा कभी-कभी तो जूतम-पैजार तक जा पहुंचती है. अब तो यह चर्चा सोशल नेटवर्किंग पर भी दिन-रात छाई रहती है. क्रिकेट के एक से बढक़र एक सो कॉल्ड धुरंधर विद्वान भोर में उठकर ही टीवी के साथ फेसबुक और ट्विटर लॉग इन कर लेते हैं. और फिर शुरू होता है सोशल नेटवर्किंग पर मैच का लाइव प्रसारण विद एक्सपर्ट ओपिनियन. द्रविड़ जैसे किसी ग्रेट वॉल के पैड और बैट के बीच से बॉल अंदर चली जाए और गिल्लियां बिखरे दे तब तो पूछिए ही मत. कोई कहता है कि एल्बो सही डायरेक्शन में नहीं था तो कोई उस गेंद को महा रद्दी करार देते हुए बताता है कि इस बॉल पर तो सीधे बॉलर के सिर के ऊपर से सिक्स जडऩा चाहिए था. कोई द्रविड़ को गड्ढा कहता है तो कोई बड़ी संजीदगी से इसे उम्र का तकाजा कह कर उन्हें रेस्ट की एडवाइस दे देता है. सहवाग, गंभीर और धौनी गलती से स्लिप में कैच थमा बैठे तो मानो पाप हो गया हो. क्रिकेट के कुछ अंधभक्त तो गुस्से में रिमोट या ग्लास टाइप की कोई चीज तक तोड़ देते हैं.

सोचता हूं कि गली-गली में कोच का आखिर माजरा क्या है. फिर मैं भी घर का बुद्धू बक्सा खोलता हूं. खबरिया चैनलों पर क्रिकेट मंडी लगी पाता हूं. हर चैनल ऐसे उछलता है कि उनका एक्सपर्ट पैनल सबसे बेहतर और अनुभवी है. पहले चैनल पर मनिंदर सिंह नजर आते हैं, दूसरे पर अतुल वासन और तीसरे पर आकाश चोपड़ा जैसे सो कॉल्ड क्रिकेट एक्सपर्ट. मनिंदर सिंह 9वें नंबर के खिलाड़ी थे, अतुल वासन भी बॉलर थे और आकाश चोपड़ा फिर भी थोड़ा खेले लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में ज्यादा कमाल नहीं दिखा पाए. बहस भी बड़ी मजेदार होती है. एक पर सचिन की टेक्नीक पर तो दूसरे पर राहुल के डिफेंस और शॉट सेलेक्शन पर और तीसरे पर धौनी की कैप्टंसी पर. देखा-देखी, कुछ ऐसी ही चर्चाएं शुरू हो जाती है गली-कूचों में. वास्तव में यही करते आए हैं खबरिया चैनल. वे मामला इतना गर्म कर देते हैं मानो विश्व युद्ध छिड़ा हो. लोग भी ऐसे ही गर्मा जाते हैं. कुछ तो स्कूल-ऑफिस से गोला मारते हैं और फिर बाद में पछताते हुए टीम इंडिया और उसके धुरंधरों को कोसते फिरते हैं. सच कहूं तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया खूब पुण्य कमा रहा है. जो क्रिकेट में खुद कोई मुकाम हासिल नहीं कर सके, उन्हें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने रोजगार मुहैया कराया है. शायद यही वजह है कि कूड़ा-करकट परोसते जाने के बादवजूद टीआरपी बटोरे जा रहा है. इतना ही नहीं, कभी-कभी तो प्रिंट मीडिया पर भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का भूत सवार हो जाता है. अब, पर्थ में अनर्थ जैसा क्या हुआ? ये मेरी समझ से परे है. माना कि हार ज्यादा ही शर्मनाक थी, लेकिन अनर्थ! ये कब और कैसे हुआ?

इस पूरी कवायद, टीका-टिप्पणी, आरोप-प्रत्यारोप, ओपीनियन-एनालिसिस के बीच एक चर्चा हमेशा दब जाती है. एक सुलझी हुई बहस जिसमें एक्सपर्ट पैनल खुद अनुभवी हो और जरूरी बातों पर मंथन हो. मेरी नजर में, जिन खिलाड़ियों पर हम सवाल उठाते हैं...वे ही हमारे तीर हैं, बाकी तो तुक्के हैं. इन खिलाड़ियों को भी अपनी महानता बनाए रखनी है और दादा (सौरभ गांगुली) जैसा हश्र नहीं करवाना है तो अच्छा प्रदर्शन करते हुए इस खेल को अलविदा कहें. देश के गली-कूचों के सभी "कोचों", खबरिया चैनलों के खतरनाक क्रिकेट विश्लेषकों और गावस्कर जैसे दिग्गजों से बस छोसी सी गुजारिश है...सचिन के सैकड़े का इंतजार हमें भी है, लेकिन उससे हर पारी में शतक की उम्मीद लगाकर बैठना सही नहीं है. खिलाड़ियों की पूजा भले कीजिए लेकिन भगवान मानने की भूल मत कीजिए, क्योंकि इससे निराशा ही हाथ लगनी है...और फिर खामखा हंगामा पूरे देश में हो जाता है!!

Monday, November 7, 2011

सीधे दिल से...


मुकम्मल रौनक की चाह में रौशनी भी जाती रही
इक ख्वाब के खातिर हमने अंधेरों से दोस्ती कर ली...

यादों के आशियाने में  वो आ आ के जाती रही
मायूसी के वायस हमने ज़िन्दगी अपनी कर दी...


Monday, October 31, 2011

सीधे दिल से...

बोल दो कि तुमने छिटके हैं रंग 
इस सूखी, फीकी सी शाम में 

बोल दो कि तुमसे ही रफू हैं 
रेडियम से कपड़े इस चाँद के 

बस इक बार, बोल दो
कि तुमने ही रोपे हैं
तुमने ही रोपे हैं
सुरों के पौधे 
बेसुध फिजाओं में...


Friday, October 21, 2011

सीधे दिल से...



कहो तो पलकें झपकाऊं
मुकम्मल ख्वाब बन जाऊं

मोहब्बत के आसमां से
सितारे अश्क के लाऊं

सुनो तो दर्द कह जाऊं
या उधारी खुशियाँ ले आऊं

कहो तो पलकें झपकाऊं
मुकम्मल ख्वाब बन जाऊं

हजारों किस्से हैं कहने
कहाँ से लफ्ज़ मैं लाऊं

कहो तो नज़्म बन जाऊं
या बिखरे शब्द रह जाऊं

कहो तो खुदा से तेरे
वक़्त मांग मैं लाऊं

कहो तो पलकें झपकाऊं
मुकम्मल ख्वाब बन जाऊं

Tuesday, August 30, 2011

मंजिल करीब, छोटा सा सफर...मुश्किल डगर





फोटो- गूगल से साभार

बात ख़ुशी की है. ऐसा आन्दोलन, इतनी जल्दी सकारत्मक परिणाम! गज़ब का जन समर्थन! २७ अगस्त ऐतिहासिक है! संसद सदस्यों ने अभूतपूर्व काम किया! राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर बेहतर कल के लिए सहमति बनाई, लेकिन क्या लगता है कि ये लोग संत हो गए? अचानक ये हृदय परिवर्तन मेरे तो गले नहीं उतर रहा. मेरी नज़र में ये सब राजनीति का हिस्सा है. आखिर क्यूँ ध्वनि मत नहीं हो पाया? सोचिये...जवाब न मिले तो इस पर बहस करिए या फिर अगले संसद सत्र का इंतज़ार कीजिए. जब तक बिल पास न हो जाये और जनता के सामने न आ जाये तब तक ये होली-दीवाली मानाने का मतलब नहीं. मेरी नज़र में ऐतिहासिक दिन वो होगा जिस दिन संसद से एक सशक्त लोकपाल बिल पास हो जायेगा.

हृदय परिवर्तन या डर?

आप सोच रहे होंगे कि ये निराशावादी और नकारात्मक सोच/नजरिया है. शौक से सोचिये. कुछ और अच्छे संबोधन दे सकते हैं मुझे. लेकिन मेरे एक सवाल का जवाब खोजिये...क्या स्टैंडिंग कमेटी ने इस सो कॉल्ड रेसोल्यूशन पर मुहर लगा दी है? ५ अप्रैल से शुरू हुआ अन्ना का पहला अनशन याद होगा आपको! तो ये भी याद होगा कि सरकार ने क्या वादा किया था! फिर क्या हुआ? कमेटी बनी, बैठकें हुईं...पवन बंसल, सुबोध कान्त सहाय और कपिल सिब्बल कि पूरी टीम लगती है...और परिणाम...१६ अगस्त से एक और अनशन. इस बार १२ दिन चलता है. पूरा देश समर्थन में कूद पड़ता है. फिर सरकार घुमावदार बयानबाज़ी करती है. अन्ना को पहले वही पार्टी सर से पांव तक भ्रष्टाचार से ग्रस्त बताती है, कुछ दिन बाद उसे महान नेता कहने लगती है. आखिर, इतनी जल्दी सोच कैसे और क्यूँ बदल जाती है. ये शब्द और आरोप अचानक आरती में क्यूँ तब्दील हो जाते हैं. जाहिर है डर! डर सरकार गिरने का! फिर ये सरकार सारे प्रयास करती है अन्ना और उनकी टीम को समझाने की. पहले विलासराव देशमुख आते हैं. उनसे बात नहीं बनती. फिर अवतरित होते हैं भय्यु जी महाराज. किस काम के लिए...अन्ना से मांडवाली करने के लिए. खुद को महाराज यानि संत बताते हैं... कुछ लोगों से उनके बारे में पाता किया गया तो पाता चलता है कि जनाब इंदौर से हैं! पहले मॉडलिंग करना चाहते थे! फिर राजनीति और संत-सन्यासी के धंधे में कूदते हैं! इनके बारे में कहा जाता है कि राजनीति के गलियारे में इनकी अच्छी पैठ है या इसे गुंडई कहना सही रहेगा.

तार तार होती है संसदीय मर्यादा

फिर भी बात नहीं बनती तो संसद में प्रस्ताव लाने की बात होती है. प्रधानमंत्री वादा करते हैं वोटिंग करने का. २६ अगस्त, दिन शुक्रवार, संसद में पेंच फ़साये जाते हैं, और बहस शनिवार को शुरू होती है. सभी दल एक एक करके अपनी राय रखते हैं. शरद यादव और लालू यादव अपना चरित्र इस महत्वपूर्ण बहस में भी दिखाने से बाज नहीं आते. घटिया बातें और वैसी ही हरकतें करते हैं! यहाँ तक कह डालते हैं कि ये तो महज़ रिफ्रेशमेंट है. यही है संसदीय मर्यादा इन सांसदों की. डंके की चोट पर कहते हैं कि पढ़ना जरूरी नहीं, जो अनपढ़ है वो सबसे बड़ा इंसान है. लोकपाल का सांसदों पर कोई अधिकार नहीं होना चाहिए. पत्रकारिता पर सवाल उठाते हैं...कहते हैं अगर ये लोकपाल बन गया तो पत्रकार लिखना भूल जायेंगे. क्या वाकई ऐसा होगा? या फिर ये लोग कुछ ज्यादा ही डरे हुए हैं. शरद यादव कथित चुटीले व घटिया अंदाज़ में किरण बेदी को धमकाते हैं. संसद में खड़े होकर मर्दानगी और गुंडई का यही सबूत देते हैं.

तस्वीर अभी धुंधली है...

यहाँ ये दोहराना बहुत जरूरी है कि ये वही लोग हैं जिन्हें हमने ही संसद भेजा है...अब सवाल ये है कि क्या इसीलिए भेजा है? ताकि वो हमारे ही बल पर हमारे खिलाफ ही बयानबाजी करें. जवाब आपके पास है. लोकपाल बिल सरकारी ही होगा, अन्ना के तीन बिन्दुओं पर स्टैंडिंग कमेटी विचार करेगी. लेकिन ये तय नहीं है कि वो दोबारा धोखा नहीं करेगी. याद रखिये, इस सरकार ने सिर्फ इन तीन बिन्दुओं पर बात करने के लिए जनता को सड़क पर उतरने पर मजबूर कर दिया. लगभग हर सांसद किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार की मलाई काट रहा है. आप खुद सोचिये, आखिर वो क्यूँ चाहेंगे कि एक ऐसा लोकपाल बिल तैयार हो जाये और सबसे पहले उनकी ही गर्दन पर तलवार लटका दे. जो सांसद ध्वनि मत से सिर्फ इसलिए डर गए कि लोग जान जायेंगे कि कौन पक्ष में है और कौन विपक्ष में, वो कैसे अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारेंगे. स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन अभिषेक मनु सिंघवी ने साफ़ शब्दों में एक बार भी नहीं कहा है कि अन्ना के तीनों बिन्दुओं को वैसे का वैसे मान लिया जायेगा. अभी वो अरुणा रॉय और डॉक्टर जयप्रकाश नारायण के ड्राफ्ट पर भी चर्चा करेंगे. और तो और, इसकी कोई समय सीमा भी नहीं दी गई है.

मीडिया की एजेंडा सेटिंग थ्योरी

मीडिया ने एजेंडा सेटिंग थ्योरी पर अच्छे से अमल किया. बड़ी खबर थी, लेकिन इसे आन्दोलन, सत्याग्रह, अगस्त क्रांति और न जाने क्या क्या मीडिया ने बनाया. सैद्धांतिक रूप से देखा जाये तो गलत नहीं किया गया. जनता को जगाना जरूरी था और ये एकदम सही मौका था. करीब 10 दिन तक रामलीला मैदान में मीडिया का जमावड़ा रहा. मीडिया ने कुल मिलाकर सराहनीय काम किया. रिपोर्टर्स दिन रात जागते रहे...अन्ना अन्ना करते रहे. हालाँकि कुछ चैनलों ने निष्पक्ष सूत्रधार का काम किया तो कुछ ने खुद ही अन्ना की टोपी पहन ली. इसे सही ठहराना थोड़ा मुश्किल है. अनशन का १२वां दिन आता है. सरगर्मी तेज होती है. माहौल गरम होता है. संसद में ऐतिहासिक बहस होती है. चोर उचक्कों से लेकर ज्ञानी-विज्ञानी अपनी बात जैसे तैसे रखते हैं. लगभग सभी पक्ष में राय देते हैं. कुछ डर को छुपा नहीं पाते और बकबक कर देते हैं. वो ही लोग वोटिंग से डरते हैं. इस बीच टीम अन्ना पहुँचती है सलमान खुर्शीद से मिलने. मीटिंग जारी है लेकिन, उसी दौरान किरण बेदी मंच पर ही चीखना शुरू कर देती हैं कि अन्ना जीत गए...हम जीत गए...देश जीत गया. और मीडिया भी बिना इस खबर कि पुष्टि किये ब्रेकिंग न्यूज़ चला देता है. हर चैनल पर जश्न होने लगता है. तभी प्रशांत भूषण और अरविन्द केजरीवाल मीटिंग से लौटते हैं. मीडिया उनपर लपकती हैं लेकिन ये क्या, ''फिर से धोखा हुआ''. प्रशांत भूषण और अरविन्द केजरीवाल का बयान संसद में पल भर में पहुँच जाता है. उनके मुताबिक विपक्ष ने वोटिंग के लिए मना कर दिया है. मामला लटक जाता है. जल्दी से चैनलों से फ्लैश हटाया जाता है. संसद में विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच सिलसिलेवार मीटिंग शुरू होती है. प्रणब मुखर्जी से मिल कर निकली सुष्मा स्वराज आरोप सिरे से ख़ारिज करती हैं और दावा करती हैं कि उनकी पार्टी वोटिंग के लिए तैयार है. प्रधानमंत्री की तरफ से तय होता है कि संसद में ध्वनि मत होगा. चैनल फिर काउंटडाउन शुरू करते हैं. कोई कहता है, १ घंटे में, कोई २ घंटे में और कोई हर दो मिनट पर कहता है कि बस दो मिनट और...

राहुल का भाषण और संसद पर सवाल

ये महज़ इत्तेफाक ही होगा कि लालू यादव अपने भाषण में वोटिंग का विरोध करते हैं और कुछ ही देर में लोकसभा ऐडजोर्न हो जाती है बिना ध्वनि मत के. एक दिन पहले उसी संसद में कॉंग्रेस के राजकुमार राहुल गाँधी शुन्य काल में नियम के विरुद्ध १५ मिनट तक देश के नाम भाषण देते हैं. लेकिन न मीडिया सरकार के पीछे पड़ता है न ही संसद इसका जवाब देती है. आश्चर्यजनक रूप से विपक्ष भी इस मुद्दे को उठाकर चुप हो जाता है. संसद में गुरुदास दासगुप्ता जब सुष्मा स्वराज के इस सवाल को दोहराते हैं तो सत्ता पक्ष से आवाज़ आती है...आपको क्या दिक्कत है. आख़िरकार प्रणब दा रेजोल्यूशन पास होने की आधिकारिक घोषणा करते हैं और विलासराव देशमुख उसकी प्रति लेकर पहुँचते हैं अन्ना के पास. अन्ना उठ खड़े होते हैं. रामलीला मैदान और देश में तमाम जगहों पर होली-दीवाली शुरू हो जाती है. मीडिया एक सुर में गाता है...अन्ना जीत गया. आला रे आला...अन्ना आला और जनता नाचती रहती है...रविवार दिन तक ये सुरूर बरक़रार रहता है...लोग भूल जाते हैं कि बिल अभी पास नहीं हुआ है. शायद ये सोचकर, कि अभी मौज कर लो, कल फिर से अनशन पर बैठ जायेंगे. और शायद इसी सोच के तहत अरविन्द केजरीवाल ने समर्थकों से आह्वाहन किया कि वो आगे भी कई ऐसे ही अनशनों के लिए तैयार रहें मानों उन्हें अनशन का दौर शुरू करना है.

चौथा मोर्चा...देश का भविष्य?

संदेह ख़त्म नहीं होते क्यूंकि सरकार और विपक्ष का चरित्र ही ऐसा रहा है. बीते कुछ वक़्त में सरकार और विपक्ष की कथनी और करनी में जमीन आसमान का फरक रहा है. मुझे उम्मीद है कि एक सशक्त कानून बन जाये! लेकिन इसके विपरीत हुआ तो...क्या फिर से ऐसा ही अनशन होगा...क्या फिर से एक बूढ़े आदमी को हम भूखा बैठाकर ब्लैकमेल ब्लैकमेल खेलेंगे. या फिर इस बार रणनीति कुछ और ही होगी. क्या इस सम्भावना को नाकारा जा सकता है कि देश को एक और मोर्चे की जरूरत है जो राष्ट्रीय हो. जो न दक्षिण का हो न उत्तर का, जो न सांप्रदायिक हो न ही भ्रष्ट, न जातिवादी हो न ही रूढ़िवादी. ऐसा एक ''चौथा मोर्चा''. सवाल ये उठता है कि कौन और कैसे बनाएगा ऐसा मोर्चा. वरिष्ठ पत्रकार भी इस सम्भावना को नहीं नकारते पर बीच बहस में अमृत सी एक सलाह निकलकर आती है. क्यूँ न इस देश को गाँधी के सपनों के देश बनाया जाये. महात्मा का मानना था कि कॉंग्रेस को भी जनसेवक संघ के रूप में काम करना चाहिए. क्या ये चौथा मोर्चा इसी रूप में काम कर पायेगा? सिविल सोसाइटी के पास अथाह जन समर्थन है. घर घर में अन्ना की बयार है. तो क्यूँ बार बार आन्दोलन किया जाए? क्यूँ न संवैधानिक और लोकतान्त्रिक तरीके से ईमानदार और निष्पक्ष जनप्रतिनिधि बनाने का एक स्वर्णिम सिलसिला शुरू हो और संसद में देश का उज्जवल भविष्य बैठे. ये मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं...फिर, कभी न कभी तो ये होना है. आज नहीं तो कल...कल नहीं तो परसों...

Thursday, August 11, 2011

दिल जब शोर करता है...

दिल की खामोश गलियों में कोई आज भी
एक आहट की आस लगाये बैठा है
कह दो उन मतवालों से कोई आज भी
नफरत की बस्ती में प्यार का बाज़ार लगाये बैठा है
लफ्ज़ कम हैं, और कहानियां ज्यादा
एक वादा इस ज़ुबां पर ताला लगाये बैठा है

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हर बात बताते रहे वो हमसे रात दिन
और एक दिन वो भी आया...
दामन छुड़ा के चल दिया हमको बताये बिन

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मुद्दतों पहले मुस्कुराये थे हम किसी के साथ
आज...कहीं किसी शहर में...
जनाज़े से मेरे बेखबर हैं, हीना से सजे हाथ

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उम्मीद करता हूँ, उन्हें हर नाम
हर इलज़ाम याद होंगे
इश्क की स्याही में डूबे वो ख़त
वो पैगाम याद होंगे
मुझसे जोड़े थे कभी उसने मोहब्बत से
मेरी डगमगाती कश्ती के
वो अरमान याद होंगे...

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उन लम्हों को महज़ लम्हे न समझना
उनमें एक ख़ूबसूरत कल सांस लेता होगा
इन बातों को महज़ बातें न समझना
इनमें कोई तो एहसास सांस लेता होगा...

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दिल के हालत कैसे हैं,
तुम्हे समझा नहीं सकता
आंखें कहती हैं कि मैं बोलूं
जुबां भी जिद पे अड़ती है
आँखें आसूं बहाती हैं
ज़ुबां खामोश रहती है
उम्मीद हैं, तड़पती हैं,
सीने में कैद कर नहीं सकता...

Friday, July 22, 2011

तमन्ना...


ऐ मुसाफिर...
क्यूँ जारी है ख़ुशी की तलाश
कितनी मायूस है तेरे सपनों की रात

ऐ मुसाफिर, पन्ने तो पलट
देख वो स्याही भी सूख गई
ढलती रही जिसमें ज़िन्दगी तेरी

तेरी इक कोशिश से बन जायेंगे
खुदबखुद असबाग
तो क्यूँ न तू नयी कहानी लिख

मैं मजबूर हूँ...मौसम की तरह
मुझपर मेरा ही बस नहीं
तेरे अरमानों ने ही ज़िंदा रखा है मुझे

मत खोज...
उसका कोई अक्स औ लिबास नहीं
उसे खोजने में तू हर ख़ुशी खो देगा,

मैं एक रोज़, तुमसे मिलने आऊँगी
मुसाफिर लेकिन इंतजार न कर
वादा रहा, तेरे हर गम का हिसाब कर जाऊँगी

मत सोच कि मैं तेरे आंसू नहीं गिनती
मैं तेरी तमन्ना हूँ, यकीं तो कर
तुझे रुलाकर मैं कैसे जी पाऊँगी...
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