Sunday, July 12, 2009

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या हो


ओ री दुनिया, ओ री दुनिया, ऐ दुनिया
सुरमई आंखों के प्यालों की दुनिया ओ दुनिया
सुरमई आंखों के प्यालों की दुनिया ओ दुनिया
सतरंगी रंगों गुलालों की दुनिया ओ दुनिया
सतरंगी रंगों गुलालों की दुनिया ओ दुनिया

अलसाई सेजों के फूलों की दुनिया ओ दुनिया
अंगड़ाई तोड़े कबूतर की दुनिया ओ दुनिया
ऐ कुरवत ले सोई क़यामत की दुनिया ओ दुनिया
दीवानी होती तबीयत की दुनिया ओ दुनिया
ख्वाहिश में लिपटी ज़रूरत की दुनिया ओ दुनिया
है इंसान के सपनों की नीयत की दुनिया ओ दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

ममता की बिखरी कहानी की दुनिया ओ दुनिया
बहनों की सिसकी जवानी की दुनिया ओ दुनिया
आदम के हवास रिश्ते की दुनिया ओ दुनिया
है शायर के फीके लफ्जों की दुनिया ओ दुनिया
गालिब के मौमिन के ख्वाबों की दुनिया ओ दुनिया
मजाजों के उन इंक़लाबों की दुनिया
फैज़े फिरको साहिर उमक्दुम मील की जोकू किताबों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
पलछिन में बातें चली जाती हैं
रह जाता है सवेरा वो ढूंढे
जलते मकान के बसेरा वो ढूंढे
जैसी बची है वैसी की वैसी , बचा लो ये दुनिया
अपना समझ के अपनों के जैसी उठा लो ये दुनिया
छिटपुट सी बातों में जलने लगेगी बचा लो दुनिया
कट पिट के रातों में पलने लगेगी बचा लो ये दुनिया
ओ री दुनिया ओ री दुनिया वो कहते हैं की दुनिया
ये इतनी नहीं है सितारों के आगे जहाँ और भी है
ये हम ही नहीं हैं वहां और भी हैं
हमारी हर एक बात होती वहां है
हमें ऐतराज़ नहीं है कहीं भी
वो आई जामिल पे सही है
मगर फलसफा ये बिगड़ जाता है जो
वो कहते हैं आलिम ये कहता वहां इश्वर है
फाजिल ये कहता वहां अल्लाह है
काबुर ये कहता वहां इस्सा है
मंजिल ये कहती तब इन्सां से की
तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया
ये उजडे हुए चंद बासी चिरागों
तुम्हारी ये काले इरादों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या हो

साभार गुलाल

Thursday, July 9, 2009

सफर में धूप तो होगी....

सफर में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो
इधर उधर कई मंजिलें हैं जो चल सको तो चलो
बने बनाये हैं सांचे जो ढल सको तो चलो
किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिराकर अगर तुम संभल सको तो चलो
यही है ज़िन्दगी कुछ ख्वाब चंद उम्मीदें
इन्ही खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो
हर एक सफर को है महफूज़ रास्तों की तलाश
हिफज़तों की रवायत बदल सको तो चलो
कहीं नहीं कोई सूरज धुआं धुआं है फिजा
ख़ुद अपने आप से बहार निकल सको तो चलो...
(ये वो मरहम है जो मुझे उस वक्त मिल गया था जब मैं चलना सीख रहा था, किसी महान शख्सीयत ने लिखा है। शायद निदा फाज़ली )

Wednesday, June 3, 2009

जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिए

कितना खूबसूरत गाना है न ये। वाकई। इस गाने की सिर्फ़ इस लाइन को अपनी जिंदगी से जोड़ के देखिये मजा आ जाता है। लगता है कि आजाद पंछी हैं हम, न कोई बंदिश है न ही कोई ठहराव। सिर्फ़ अनंत आकाश है और सपनों को परवाज़ मिल गए हैं। ख़ास बात है कि इन्हे कोई कतरने वाला भी नहीं है...आसमान अपना है और उड़ान की कोई सीमा नहीं है। सोचिये सिर्फ़ इतना सा बदलाव आ जाए तो कितना सुख मिलता है।
मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, या कहिये ऐसा ही एहसास हुआ। और सारी टेंशन छू मंतर हो गई। लगा जैसे प्यार में असीम ताकत है, इसके आगे कोई दुःख का अस्तित्व नहीं है । सारी परेशानियाँ बस यहाँ आकर थम जाती हैं, और धीरे से खुशी चेहरे पर वापस आ जाती है। सही कहा गया है कि आपको कितना भी क्यों न पता हो, कोई दूसरा वही बात कहता है तो असर करती है। मुझे एक सबक मिला। सबको लेना चाहिए। तभी जिंदगी का कोई मतलब है। एक जिंदगी है जिसे हम संवार सकते हैं।
किसके चेहरे पे उदासी रंग लाती है।
ये जालिम दुनिया ही खूब सताती है॥
हमारे चेहरे पर भी हँसी खिल के आती है, जब
एक अदनी सी खुशी भी झिलमिलाती है॥

Saturday, May 30, 2009

संवेदनशीलता, मैं और बिग बैंग

ये यूनिवर्स भी तो धूल की तरह है... न कुछ नया है न कुछ पुराना। बिग बैंग फिर कुछ कण, कुछ क्षण फिर ब्लैक होल. फिर एक और बिग बैंग. जीवन का यही फसाना है एक धुंध से आना है एक धुंध में जाना है.

जब भी इसे पढ़ता हूँ शरीर में अजीब सी ताकत का एहसास होता है। लगता है की मैं भी कहाँ छोटी छोटी बातों में उलझ जाता हूँ। बस एक बिग बैंग और जिंदगी नए ट्रैक पर होगी। न कुछ नया होगा न कुछ पुराना। नया होगा...ब्लैक होल। और कुछ कद जो इधर से उधर होंगे. फ़िर भी लंबा सफर तय करना है। कई राहों पर चलना होगा, नए मील के पत्थर रखने होंगे। इसके लिए ऐसे कई बिग बैंग हो जायें तो क्या!

लेकिन सवाल ये है की हम धुंध की विवेचना किस रूप में करें। इस धुंध में न जाने कितने मतलब छिपे हैं। मैं तो एक धुंध से निकलकर प्रकाश पुंज में जाना चाहता हूँ। फ़िर ये भी तो एक प्रकाश पुंज है। सीखने को हर लम्हे ने कुछ न कुछ दिया है न। फ़िर धुंध कैसा?
शायद सोच और व्यवहार का।
सोच में भी धुंध है...देखिये तो हर अज्ञानता भरा वाक्य धुंध का ही तो पर्याय है... और वोही व्यव्हार में झलकता है जो की बहुत दर्द देता है।
क्यों न इस धुंध के असल मतलब को तलाश के अपनी जिंदगी के बचे- कुचे दिनों को तराशा जाए....
जिंदगी को मुस्कराने दिया जाए... न जाने कल हो न हो॥

Monday, May 25, 2009

अपनी इज्जत अपने हाथ

एक जानने वाले हैं मेरे। काफी गरम मिजाज। कुछ दिन पहले कुछ बात चली। मजाक मजाक में उनकी आवाज़ थोडी व्यंगात्मक और तल्ख़ हो गई. लगा जैसे उनके दिल की बात बहार गई। उसमें काफी तड़प थी, लगा जैसे वो नहीं उनकी कसमसाहट बोली। कहा 'कल फ़िर झूट से सुबह की शुरुआत होगी, वोही तेल लगना होगा, चार पुलिस वालों को गरियाकर खुश हो जायेंगे। सोचेंगे बड़े पत्रकार हैं।' क्या यही स्तर रह गया है पत्रकारिता का? क्या हर पत्रकार कमोबेश ऐसा ही सोचता है?
यह सोचना जरुरी है...कहीं हम अपने लिए ही तो गड्ढा नही खोद रहे हैं। हम सबको अपनी सीमा बनानी होगी....

Friday, April 24, 2009

कोशिशें जरी रहेंगी..



काफी दिनों से एक कोशिश कर रहा था। एक नेक काम करने की। देश के लिए कुछ करने की ठानी थी। सोचा था ये शुरुआत बदलाव लाएगी। देश की सोच बदलेगी और न जाने क्या क्या। बस एक हफ्ते पहले की बात है। ऑफिस में यूँ ही कुछ बात चली। एक विचार आया। वोटर अवारेनेस कम्पैन का। गांव में काम किया ही हुआ था तो सोचा शहर में भी कर ले जायेंगे और रिजल्ट अच्छे होंगे। पर हमने सोचा कि हम सिर्फ़ युवाओं को ही जागरूक करने का काम करेंगे। बस उसी शाम बात की और अपने एक साथी के साथ जी जान से लग गए इस काम में । अगले दिन बैठे और रात ३ बजे तक प्रोपोसल बनाया की कुछ स्पांसर मिल जायेंगे। देश के लिए तो बहुत लोग आगे आयेंगे ऐसा सोचकर अगली सुबह से लोगों को फ़ोन लगना शुरू कर दिया, एक नामचीन हस्ती से भी बात कर ली ताकि युवा जमा हो जायें और हमारा संदेश सब तक पहुँच जाए। बातें चल रही थी, पहली शाम तक लगा सब कुछ धमाकेदार अंदाज़ में होगा। फ़िर कुछ और लोगों से बात करने की हिम्मत मिली, दौड़ भाग की, लोगों के दफ्तर गए, मिले, अपना प्लान समझाया, कईयों को फ़ोन कर करके खूब समझाया..सबने तारीफ की....
.... पता नहीं खुदा को क्या मंजूर था , और हमारा इवेंट नही हो सका, मन टूट सा गया। लगा जाने क्या कमी रह गई। सारी मेहनत बेजान सी लगने लगी। फ़िर पिछले ७ दिनों में आए बदलाव पर गौर फ़रमाया, लगा अभी तो शुरुआत है, बहुत लंबा सफर तय करना है। फ़िर ऐसी चोटें ही तो मजबूती देंगी। लगता है कि सब कुछ मुमकिन है ज़िंदगी की
इस किताब में। इसकी कहानी हम ख़ुद लखते हैं। अच्छे शब्द वाक्यों में तब्दील होंगे और किताब में जान आ जाएगी। लेकिन इस कोशिश (जो साकार थी पर परिणाम नही मिले) कई कोशिशों के लिए प्रेरित करेगी।
और एक दिन मैं इस देश कि तस्वीर बदलूंगा।

Thursday, April 2, 2009

मैं आजाद होना चाहता हूँ


आज न जाने कैसे उस ब्लॉग पर गया। जखम ताजे हो गए। हर बार मेरे मन में कुछ सवाल उठते जब भी मैं किसी नए काम की शुरुआत करता। काफी दिनों से अपने अन्दर के उस जिज्ञासु पगले को एक बंद अंधेरे कमरे में कैद कर रखा था। आज तेज हवाओं ने उस दरवाजे की खिड़की खोली और आवाजें जोर जोर से बहार आने लगीं। फ़िर वही सवाल, किसके लिए काम कर रहे हो? अच्छा ये सब करके क्या पाओगे? तुम तो शान्ति चाहते थे न तो किसी ऐसी जागे क्यों नहीं जाते जहाँ तुम्हे कोई नही जनता? अपने लिए कब जीना शुरू करोगे? कब तक अपने दिमाग को सिर्फ़ जी हुजूरी और बाबूगिरी में लगोगे? ऐसे न जाने कितने सवाल बारी बारी दिमाग पर खटखटा रहे हैं... शोर हद से ज्यादा बढ़ता है तो कोशिश कर रहा हूँ क्यों न ये सवाल जवाब हमेशा की तरह यही कहकर टाल दिए जाएं की जिंदगी अपने लिए जी तो क्या किया? लगता है की कहीं स्वार्थी समाज की सोच से प्रभावित तो नहीं हो रहा हूँ। माँ बाप ने यही सोचा होता तो कहाँ होते हम? जिन्होंने बेशुमार प्यार लुटाया उनके लिए एक जिंदगी कुर्बान ही सही...पर ऐसी भी क्या जिंदगी जिसमे कदम कदम पर धोखा है और रास्तों पर सिर्फ़ और सिर्फ़ झूठ के ढेर लगे हैं....
ये जिंदगी भी अजीब है और उससे भी कहीं अजीब हैं ये मेरे सवालों का बेतरतीब सफर। हर बार मेरे लिए सन्यास का रास्ता प्रशस्त करने का मौका ढूंढ़ता है पगला। लेकिन सच कहूँ तो ये सवाल काफी संजीदा हैं...नहीं ये तो बचकाने सवाल हैं..होंगे। पर मेरे पास कोई जवाब नहीं। शायद जिंदगी का एक दिन ऐसा भी होगा जब मैं इन सवालों का दिल खोल जवाब दूँगा। मैं उदास नहीं, लिखने के बाद वैसे ही जिऊंगा जैसा दुनिया में चलता है। पर मौका मिला तो...देखते हैं।
शब्बखैर। । ।
कुछ ऐसा ही लिखा जाता है जब मन की आवाज़ शब्द में तब्दील होती जाती है...
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