Tuesday, April 20, 2010

फिर पंख मैं चुनुँगा, परवाज मैं भरूँगा


तमन्ना भी साथ थी, कोशिश भी थी जवां,
राहें भी साथ थीं, मंजिल भी मेहरबां।
खुद में हौंसला, उसकी नेमत पे था यकीं ,
लौ जल रही थी अबकी, बाती भी थी बची।
फूंक के भी जर्रों, पर रोक थी लगी,
फिर भी वो बुझ गई, मायूस हो गई।
मैं देखता रहा, आंसू पोंछता रहा,
सॉरी बोलकर उसने, कर दिया विदा।
बेबसी में रोया, उस बरस का रतजगा॥
गिरेबां में झांक लेता, वो भी था ''मैं'' कभी,
आज वो न जाने किस माटी का बना।
मैं धरती से उठा था, धरती पे आ गिरा ,
नापने को फिर से सारा आकाश है पड़ा ।
फिर पंख मैं चुनुँगा, परवाज मैं भरूँगा,
आँधियों में भी लौ को, बुझने मैं दूंगा।
वक़्त भी कभी तो, हमसे रास्ते पूछेगा,
वो भी अपनी बाजुओं में, आंसू पोंछेगा॥

(माफ़ करना दोस्तों, क्या करूँ, कंट्रोल नहीं होता...दर्द है तो दर्द ही नजर आएगा न!)

4 comments:

Shekhar Kumawat said...

bahut khub


shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

anubhuti said...

dard hi to jeena sikhata hai dost. yahi dard n ho to shayad jeene ka matlab hi n ho. kuch yaden jindi bhar sath rahti hai.............apne dard ko kafee khoobsurat shbdon me dhala apne.

पश्यंती शुक्ला. said...

हर किसी की जिंदगी की सच्चाई है दर्द....आपकी भी हमारी भी और शायद हम सब की, हर किसी ने कई मौके ऐसे देखे होंगे बस आपमें और उन कई दर्द झेलने वालों में फर्क ये है कि आपको शब्दों में उस दर्द को बांधना आता है.........और उनको उसे सिर्फ झेलना.

अक्षिता (पाखी) said...

बहुत बढ़िया लिखा आपने...पसंद आई आपकी रचना.
______________
पाखी की दुनिया में- 'जब अख़बार में हुई पाखी की चर्चा'

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