
पांच बजकर ग्यारह मिनट हो रहें हैं। रात कितनी जल्दी बीत गई, पता नहीं चला। हालाँकि ये रात बहुत मायनों में ख़ास भी है। यकीन नहीं हो रहा है कि मैं ३ रात से सोया नहीं हूँ फिर भी आँखों में नींद नहीं है. ये भी लग रहा है कि नींद अब न जाने कब आएगी. खैर, फेसबुक पर किसी को एक मैसेज किये हुए करीब पद्रह मिनट तो हो ही रहें होंगे. उन्होंने महीना दो महीना पहले एक मुद्दे पर कुछ लिखा था, उसपर अपना कमेन्ट याद आ गया। उस वक़्त न उन्होंने कुछ कहा था, न ही हमने सोचा था। आज वो बात साल रही है।
जमीन और दीवारों पर बिखरे खून के कतरे, कूड़े के ढेर जैसी लाशें, खुद से लड़ने का वो डर और जले हुए घर- बार आँखों में पानी बनकर उतराते तो लगता कि मेरा सोचना गलत था। अपने एक एक शब्द का मोल पता चलता. एहसास होता कि सोच, तर्क और कुतर्क कुछ भी दिया जाये, जिन्हें मारा गया, उनकी कोई गलती नहीं थी। न ही वो कभी वापस आ पाएँगे. उन्होंने तो नहीं लगाई थी ट्रेन में आग। उन गर्भवती माओं का क्या कसूर था? उन बच्चों का क्या कसूर था जो यतीम हो गए? यही कि उनके नाम के आगे खान, शेख, पठान या कुरैशी लगा था? किसका गुजरात है ये? वह एक राक्षस है जिसने सैकड़ों लोगों के खून से अपना राजतिलक किया है।
समझ में आ गया कि नई पौध में इतना जहर क्यूँ भरा है। मोदी जैसे लोग जिम्मेदार हैं। मोदी और उनके साथी-आदमी इसके लिए जिम्मेदार हैं। खून का बदला खून किस समाज कि रीति है? और ये कहाँ ख़त्म होती है? कुछ लोगों के साथ मैं भी मोदी को बार बार कटघरे में खड़ा किये जाने पर सवाल करता था कि सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर पर भी सवाल कीजिए। लेकिन अचानक लगा कि मैं कहीं न कहीं दूषित मानसिकता से प्रभावित था। आज वो पर्दा हट गया। मैं साफ़ देख सकता हूँ। जिम्मेदार कोई भी हो, और उसने कितना भी अच्छा काम क्यूँ न किया हो, वो सजा का हकदार है। दुःख तो सबसे ज्यादा तब होता है जब लोगों और समाज कि बराबर से रक्षा करने के लिए बनाया गया कानून भी इन जैसे गिरे हुए लोगों के हाथ कि कठपुतली बनकर रह जाता है। सच कहूँ तो ये भारत नाम की एक बेहद खूबसूरत किताब में लगे दीमक हैं जिन्हें जल्द से जल्द मार देना चाहिए।
दरअसल ये सब कुछ दो घंटे की एक कहानी ने सोचने पर मजबूर कर दिया। यह कहानी फ़िराक फिल्म की है। अभी कुछ देर पहले ही तो फ़िराक देख कर उठा हूँ। रात भर जगा इसे देखने के लिए, अब सोचते सोचते कई रातें कटेंगी। ये हर मोड़ पर एक सवाल दे गई है मुझे। ये फ़िराक देखने के बाद कई सवालों की फ़िराक में न जाने कहाँ कहाँ भटकना है मुझे। उम्मीद है की हर हिन्दुस्तानी को इसने सोचने पर मजबूर किया होगा। आखिर, अच्छा या बुरा न हिन्दू होता है न ही मुस्लिम, न सिख न ही इसाई, वो तो महज एक इंसान होता है।
बताता चलूँ कि मैं विकास के मानक पर मोदी और नितीश का प्रशंशक रहा हूँ पर आज खुद पर कोफ़्त हो रही है। मोदी के लिए. यहाँ एक बात और साफ़ कर देना जरूरी है कि मोदी जैसी सोच हर धर्म में है और इस सोच का ही नतीजा है कि भारत में आतंरिक मुस्लिम और हिन्दू आतंकवाद बढ़ रहा है। इसी सोच के परिणामस्वरूप मासूम बेमौत मर रहे हैं, मेहनत और खून पसीने की कमाई से बने आशियाने जल रहें हैं...
थैंक्स टु नंदिता दास, दरअसल उनका पहला निर्देशन देखने के लिए ये फिल्म देखी थी। काफी कुछ मिल गया।
जमीन और दीवारों पर बिखरे खून के कतरे, कूड़े के ढेर जैसी लाशें, खुद से लड़ने का वो डर और जले हुए घर- बार आँखों में पानी बनकर उतराते तो लगता कि मेरा सोचना गलत था। अपने एक एक शब्द का मोल पता चलता. एहसास होता कि सोच, तर्क और कुतर्क कुछ भी दिया जाये, जिन्हें मारा गया, उनकी कोई गलती नहीं थी। न ही वो कभी वापस आ पाएँगे. उन्होंने तो नहीं लगाई थी ट्रेन में आग। उन गर्भवती माओं का क्या कसूर था? उन बच्चों का क्या कसूर था जो यतीम हो गए? यही कि उनके नाम के आगे खान, शेख, पठान या कुरैशी लगा था? किसका गुजरात है ये? वह एक राक्षस है जिसने सैकड़ों लोगों के खून से अपना राजतिलक किया है।
समझ में आ गया कि नई पौध में इतना जहर क्यूँ भरा है। मोदी जैसे लोग जिम्मेदार हैं। मोदी और उनके साथी-आदमी इसके लिए जिम्मेदार हैं। खून का बदला खून किस समाज कि रीति है? और ये कहाँ ख़त्म होती है? कुछ लोगों के साथ मैं भी मोदी को बार बार कटघरे में खड़ा किये जाने पर सवाल करता था कि सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर पर भी सवाल कीजिए। लेकिन अचानक लगा कि मैं कहीं न कहीं दूषित मानसिकता से प्रभावित था। आज वो पर्दा हट गया। मैं साफ़ देख सकता हूँ। जिम्मेदार कोई भी हो, और उसने कितना भी अच्छा काम क्यूँ न किया हो, वो सजा का हकदार है। दुःख तो सबसे ज्यादा तब होता है जब लोगों और समाज कि बराबर से रक्षा करने के लिए बनाया गया कानून भी इन जैसे गिरे हुए लोगों के हाथ कि कठपुतली बनकर रह जाता है। सच कहूँ तो ये भारत नाम की एक बेहद खूबसूरत किताब में लगे दीमक हैं जिन्हें जल्द से जल्द मार देना चाहिए।
दरअसल ये सब कुछ दो घंटे की एक कहानी ने सोचने पर मजबूर कर दिया। यह कहानी फ़िराक फिल्म की है। अभी कुछ देर पहले ही तो फ़िराक देख कर उठा हूँ। रात भर जगा इसे देखने के लिए, अब सोचते सोचते कई रातें कटेंगी। ये हर मोड़ पर एक सवाल दे गई है मुझे। ये फ़िराक देखने के बाद कई सवालों की फ़िराक में न जाने कहाँ कहाँ भटकना है मुझे। उम्मीद है की हर हिन्दुस्तानी को इसने सोचने पर मजबूर किया होगा। आखिर, अच्छा या बुरा न हिन्दू होता है न ही मुस्लिम, न सिख न ही इसाई, वो तो महज एक इंसान होता है।
बताता चलूँ कि मैं विकास के मानक पर मोदी और नितीश का प्रशंशक रहा हूँ पर आज खुद पर कोफ़्त हो रही है। मोदी के लिए. यहाँ एक बात और साफ़ कर देना जरूरी है कि मोदी जैसी सोच हर धर्म में है और इस सोच का ही नतीजा है कि भारत में आतंरिक मुस्लिम और हिन्दू आतंकवाद बढ़ रहा है। इसी सोच के परिणामस्वरूप मासूम बेमौत मर रहे हैं, मेहनत और खून पसीने की कमाई से बने आशियाने जल रहें हैं...
थैंक्स टु नंदिता दास, दरअसल उनका पहला निर्देशन देखने के लिए ये फिल्म देखी थी। काफी कुछ मिल गया।
3 comments:
kabhi khul ke 'mau ke dangon' pe ya abhi haal me huey 'bareilly riots' pe log itne bhavuk ya kahein 'pareshan' kyon nahi ho uthtey...jehar to ghul chuka hai dost, koshish karlo tum bhi iska asar khatm karne ki...
i also want to see this film now.... i agree with you and for sure modi deserves it and even more than this but yaar just tell me only his deeds are building the chasm between the religions??? i think along with him people like mayawati, mulayam etc etc should also be punished coz they too are playing with the lives of the people in one or the other ways and in the name of castes and religion they are inciting innocent people to take savage steps against each other... and behind every communal riot there are always few politicians...sometimes openly and sometimes anonymously... simply disgusting.......
well nice writeup dear... i completely go with ur words...
gud luck....
पहले तो धन्यवाद की आप हमारे महुल्ले तक आए...ठीक ही है अनकही नाम खींच ही लेगा..लेकिन आपके इस लेख में बहुत कुछ है कई बातों के सवाल हैं तो कई के जवाब भी.....कुछ जवाबों की फिराक में बहुत से जवाब दे गए आप..हमारे घर आते जाते रहिएगा और हम आपके...
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